Friday, August 11, 2017

तिरुपति से चेन्नई होते हुए रामेश्वरम की ट्रेन यात्रा

तिरुपति से चेन्नई होते हुए रामेश्वरम की ट्रेन यात्रा 






तिरुमला स्थित भगवान् वेंकटेश्वर और तिरुपति स्थित देवी पद्मावती के दर्शन करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के पश्चात हमारा अगला पड़ाव रामेश्वरम था, जिसके लिए हमें पहले तिरुपति से चेन्नई सेंट्रल तक एक ट्रेन के सफर के बाद चेन्नई एग्मोर से रामेश्वरम तक का सफर दूसरे ट्रेन से करना था। दोनों ट्रेन की हमारी बुकिंग पहले से ही थी इसलिए सीट की भी कोई चिंता नहीं थी। पद्मावती मंदिर के दर्शन करके मन में एक नई ऊर्जा भर गई थी, क्योंकि इस जगह पर जाने के लिए न तो मैंने सोचा था और न ही यहाँ जाने की कोई योजना थी और हम थोड़े से खाली समय का सदुपयोग करके इस मंदिर के दर्शन भी कर लिया। शायद इस मंदिर के दर्शन न करता और बाद में लोगों से ये सुनता कि जितना समय हमारे पास था उससे कम समय में इस मंदिर के दर्शन किये जा सकते थे तो बाद में बहुत अफ़सोस होता, पर अब कोई अफ़सोस नहीं था। अब अगर कुछ था तो एक नयी ऊर्जा के साथ आगे की यात्रा के लिए बढ़ना। हमारी ट्रेन 10 बजे थे और 9:30 बज चुका था और हमें यहाँ से निकलकर स्टेशन के लिए प्रस्थान करने का समय हो चुका था। 

Friday, August 4, 2017

देवी पद्मावती मंदिर (तिरुपति) यात्रा और दर्शन

देवी पद्मावती मंदिर (तिरुपति) यात्रा और दर्शन



तिरुमला की सप्तगिरि पहाड़ियों में स्थित भगवान् वेंकटेश के दर्शन के उपरांत हम कल ही तिरुमला से तिरुपति आ गए थे और आज हमें तिरुपति से चेन्नई होते हुए रामेश्वरम जाना था। हमारी ट्रेन दिन में 10 बजे थी और प्लान तो यही था कि सुबह सुबह तिरुपति शहर में एक दो घंटे घूमने के बाद निर्धारित समय पर स्टेशन पहुंचना है, पर एक मित्र के सुझाव के अनुसार मुझे अपनी योजना बदलनी पड़ी। अब हम तिरुपति के बाज़ारों में भटकने के बजाय देवी पद्मावती के दर्शन के लिए जाना था। वैसे तो पद्मावती मंदिर के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी थी कि ये मंदिर तिरुपति में स्थित है पर यहाँ कैसे जाएं और जाने के बाद कितना टाइम लगेगा ये सब पता नहीं होने के कारण मैंने इसे अपनी योजना में शामिल नहीं किया था। कभी कभी बिना सोचे हुए भी कुछ हो जाता है और यही मेरे साथ हुआ। कल रात में एक मित्र नरेंद्र शोलेकर ने मुझे पद्मावती मंदिर और वहां जाने के बारे में बताया और मैं वहां जाने को झट तैयार हो गया। शायद उनका मार्गदर्शन न होता तो शायद इस मंदिर के दर्शन से मैं वंचित रह जाता। 

Friday, July 28, 2017

तिरुपति बालाजी (वेंकटेश्ववर भगवान, तिरुमला) दर्शन

तिरुपति बालाजी (वेंकटेश्ववर भगवान, तिरुमला) दर्शन





एक बहुत लम्बे इंतज़ार और लम्बे सफर के बाद हम आज उस जगह पर पहुंचे हुए थे, जहाँ हर दिन लाख लोग अपनी अपनी मुरादें लेकर आते रहते हैं लेकिन मैं यहाँ कोई मुराद या मन्नत लेकर नहीं आया था, मैं तो बस उस दिव्य जगह के दिव्य दर्शन के लिए यहाँ आया था। हर दिन सोचा करता था कि आखिर ऐसा क्या है उस जगह पर जहाँ हर दिन इतने सारे लोग जाते हैं और आज हम भी उसी जगह पर पहुंचे हुए हैं। शहरों की भाग दौड़ वाली जिंदगी से दूर यहाँ एक अलग ही शांति थी और इतने सारे लोग एक दूसरे से अनजान होते हुए भी अनजान नहीं दिख रहे थे। यहाँ एक साथ पूरे देश से आये हुए लोग देखे जा सकते हैं। सबकी अलग भाषा, अलग रहन सहन, अलग खान पान होते हुए भी यहाँ सब एक ही रंग में रंगे हुए नज़र आ रहे थे और वो रंग था भक्ति का। इस भीड़ में कुछ दूसरे देश के लोग भी दिखाई दे जाते थे और वो भी यहाँ आकर भक्ति के रंग में सराबोर थे। यहाँ आया हुआ हर व्यक्ति देश, राज्य, जाति, वर्ग, गरीब, अमीर को भूल कर बस भक्ति में लीन अपनी ही धुन में चला जा रहा था। यहाँ की स्थिति को देखकर मन में बस एक ही ख्याल आ रहा था कि काश हर जगह बस ऐसी ही शांति हो, जहाँ कोई किसी के आगे या पीछे न होकर बस एक साथ चल रहे हों। 

Friday, July 21, 2017

चेन्नई से तिरुमला

चेन्नई से तिरुमला


चेन्नई के बाद हमारा अगला पड़ाव तिरुमला था, जहाँ पहुँच कर रात में रुकना था और अगले दिन भगवान वेंकटेश्वर के दर्शन करना था। चेन्नई से तिरुपति तक का सफर ट्रेन और तिरुपति से तिरुमला तक का सफर बस से करना था। भगवान वेंकटेश्वर का मंदिर तिरुमला की पहाड़ियों में स्थित है जो तिरुपति से बस से द्वारा 22 किलोमीटर और पैदल जाने वाले के लिए 10 किलोमीटर की चढ़ाई है। तिरुपति से तिरुमला पर्वत पर गाड़ियों के लिए जाने का अलग और आने का अलग मार्ग है, मतलब एकतरफा रास्ता है। वैसे चेन्नई से तिरुपति तक बस या ट्रेन दोनों से जाया जा सकता है। चेन्नई से तिरुपति की बसें बहुतायत में मिलती है। तिरुपति के पास में रेलवे का बड़ा स्टेशन रेनिगुंटा है, जहाँ के लिए चेन्नई से दर्जन भर से ज्यादा ट्रेनें है पर तिरुपति के लिए कुछ ही ट्रेन है।आप अगर ट्रेन से जा रहे हैं तो रेनिगुंटा या तिरुपति दोनों जगह से आपको तिरुमला के लिए बस और जीप बहुत आसानी से और बहुतायत में मिलती है। चेन्नई से तिरुपति की हमारी ट्रेन दोपहर 2:15 बजे थी और करीब 1:30 बजे हम वेटिंग रूम से प्लेटफार्म पर आकर ट्रेन का इंतज़ार करने लगे। 

Friday, July 14, 2017

मरीना बीच, चेन्नई (Marina Beach, Chennai)

मरीना बीच, चेन्नई (Marina Beach, Chennai)





सुबह 7 बजे चेन्नई सेंट्रल रेलवे स्टेशन पर ट्रेन से उतरते ही हमारे सफर का पहला पड़ाव पूरा हो चुका था। यहाँ से आगे का हमारा अगला पड़ाव तिरुमला था, जिसका सफर हमें चेन्नई से तिरुपति तक ट्रेन से और उसके आगे तिरुपति से तिरुमला तक बस से तय करना था। चेन्नई से तिरुपति जाने वाली हमारी ट्रेन दोपहर बाद 2:15 बजे थी और अभी सुबह के 7 ही बजे थे मतलब मेरे पास 7 घंटे का समय था। अब 7 घंटे स्टेशन पर बैठ कर व्यतीत करना मुझे उचित नहीं लगा। अब बात ये थी कि जाएँ तो जाएं कहाँ। चेन्नई में कहीं जाना या रुकना नहीं था इसलिए यहाँ के लिए कुछ सोचा नहीं था। सोच कर तो यही आये थे कि ट्रेन 2-4 घंटे दो देर होगी ही, पर ट्रेन ने समयानुसार मुझे चेन्नई पंहुचा दिया इसलिए अभी मेरे साथ 'किं कर्तव्य विमूढ़' वाली स्थिति पैदा हो गयी थी। हम सोचने में लगे हुए और समय अपनी ही गति से चला जा रहा था। 

Friday, July 7, 2017

दिल्ली से चेन्नई : एक लम्बी ट्रेन यात्रा

दिल्ली से चेन्नई : एक लम्बी ट्रेन यात्रा



4 महीने से जिस दिन का इंतज़ार कर रहा था आख़िरकार वो दिन आ गया। आज रात 10 बजे तमिलनाडु एक्सप्रेस से चेन्नई के लिए प्रस्थान करना था। मम्मी पापा एक दिन पहले ही दिल्ली पहुंच चुके थे। यात्रा की सारी तैयारियां भी लगभग पूरी हो चुकी थी। मैं सुबह समय से ऑफिस  के लिए निकल गया। चूंकि ट्रेन रात में 10:30 बजे थी इसलिए ऑफिस से भी समय से पहले निकलने की कोई जल्दी नहीं थी, पर ये घुम्मकड़ मन कहाँ मानता है और 4 बजे ही ऑफिस से निकल गया। घर आकर तैयारियों का जायजा लिया और बची हुई तैयारियों में लग गया। 7 बजे तक सब कुछ तैयार था, बस अब जाते समय सामान उठाकर निकल जाना था। साढ़े सात बजे तक सब लोग खाना भी खा चुके और 9 बजने का इंतज़ार करने लगे। अभी एक घंटा समय हमारे पास बचा हुआ था और इस एक घंटे में मेरे मन में अच्छे-बुरे खयाल आ रहे थे, अनजान जगह पर जहाँ भाषा की समस्या सबसे ज्यादा परेशान करती है उन जगहों पर पता नहीं क्या क्या समस्या आएगी। इसी उधेड़बुन में कब एक घंटा बीत गया पता नहीं चला।

Friday, June 30, 2017

दक्षिण भारत यात्रा की शुरुआत

दक्षिण भारत यात्रा की शुरुआत



करीब 3 साल पहले तिरुपति जाने का विचार किया था पर तब से वहां जाने का समय नहीं निकाल पाया।समय नहीं निकल पाने का कारण भी कम रोचक नहीं है। जब भी तिरुपति जाने की बात घर में करता तो पत्नी साथ साथ रामेश्वरम भी निपटा लेने की बात कहती। उसके बाद मैं भी कुछ और जोड़ देता कि जब तिरुपति और रामेश्वरम निपटा ही देना है तो मदुरै का मीनाक्षी मंदिर और कन्याकुमारी को क्यों छोड़ें, लगे हाथ यहाँ भी हो लें और इसी चक्कर में योजना बन ही नहीं पा रही थी। गर्मियों में उधर पड़ने वाली भयंकर गर्मी के कारण उधर जाने का सोच भी नहीं सकता था और सर्दियों में इतनी लम्बी छुट्टी मिल पाना भी मुमकिन नहीं था। इसी बीच केदार-बदरी यात्रा भी कर ली पर तिरुपति जाने का समय निकल नहीं पाया।

Wednesday, June 21, 2017

केदारनाथ से वापसी

केदारनाथ से वापसी 

पाँचवाँ दिन

कल जिस उमंग और उत्साह से गौरीकुंड से केदारनाथ आये थे आज उसके विपरीत उदास और भारी मन से केदारनाथ से वापसी  की राह पकड़नी थी। यहाँ से जाने का मन तो नहीं हो रहा था पर वापस तो जाना ही था। आज हमारी यात्रा केदारनाथ से गौरीकुंड तक पैदल मार्ग और उसके आगे गौरीकुंड से गौचर तक बस यात्रा की थी। 

4 दिन तक जो 3 बजे ही जागने की आदत हो गयी थी उसके वजह से आज हम बिना अलार्म बजे ही 3 बजे जग गए। सारा सामान पैक किया और सारी तैयारी करते करते 4 :30 हो गए थे। अब हम निकलने की सोच ही रहे थे कि एक आदमी चाय की बड़ी से केतली लेकर आया जो हरेक हट जिसमें लाइट जल रही थी उसमें चाय दे रहा था। उसने हम लोगों को भी चाय दी। उसके चाय की कीमत जो थी बहुत ही आश्चर्यजनक थी। एक कप चाय केवल 10 रुपए। इतनी ऊँचाई पर 10 रुपए में चाय बहुत कम लग रही थी। यहाँ तो उसकी कीमत 20 रुपए भी होती तो कम होती। उसके बाद मैंने उससे पूछा कि जाने से पहले किसे बताना होगा तब उसने कहा कि किसी को बताने की जरुरत नहीं है आप अपना सामान लेकर जा सकते हैं। उसके बाद वो दूसरे को चाय देने चला गया।

Monday, June 19, 2017

मुगल गार्डन, दिल्ली (Mughal Garden, Delhi)

मुगल गार्डन, दिल्ली (Mughal Garden, Delhi)

12 मार्च 2017
इस साल मुझे दूसरी बार मुग़ल गार्डन जाने का मौका मिला। पहली बार मुग़ल गार्डन फरवरी 2015 में गया था और आज 2 साल बाद एक बार फिर वहां जाने जाने का मौका मिला।  मुग़ल गार्डन राष्ट्रपति भवन के पीछे के भाग में स्थित है। यहाँ जितने प्रकार के फूलों प्रजातियां है शायद देश के किसी भी उद्यान में फूलों की  इतनी प्रजातियां नहीं होगी, और हो भी क्यों नहीं आखिर इतने बड़े देश के राष्ट्रपति (राजा) का बगीचा जो है। बसंत के मौसम में इस गार्डन की सुंदरता अपने शबाब पर होती है, और यही वो समय होता है  जब इसे आम लोगों के लिए खोला जाता है। वैसे यहाँ आम लोगों के लिए साल में 11 महीने प्रवेश निषिद्ध है पर साल में एक महीने मध्य फरवरी से मध्य मार्च तक (दो चार दिन आगे पीछे) मुग़ल गार्डन पूरे देश के नागरिकों के लिए खुला रहता है।

Saturday, May 20, 2017

पठानकोट से दिल्ली (Pathankot to Delhi)

पठानकोट से दिल्ली (Pathankot to Delhi)


इस पोस्ट को लिखने से पहले मैं बार बार यही सोच रहा था कि मैं अगर इससे पीछे वाली पोस्ट को ही अगर मैं थोड़ा और बड़ा कर देता तो ये पोस्ट लिखनी नहीं पड़ती, और अगर उसी पोस्ट में इसे जोड़ भी देता तो शायद पोस्ट लम्बी और उबाऊ हो जाती।  खैर रहने दीजिये इन बातों को, इन बातों का कोई निष्कर्ष तो निकलने वाला है नहीं तो उसके बारे में बोलने या लिखने से क्या फायदा। अब आज की यात्रा की बात करते हैं। 

5 दिन पहले में जिस सफर की शुरुआत की थी आज उसके अंजाम तक पहुँचने का दिन आ चुका था। कल पूरे दिन बस और ट्रेन का सफर (करीब 110 किलोमीटर बस और करीब 220 किलोमीटर ट्रेन का सफर) और इधर उधर की भागा-दौड़ी का ये प्रभाव हुआ कि आज सुबह उठने का मन बिलकुल नहीं हो रहा था। 4 :30 बजे अलार्म बजने के साथ ही नींद टूटी तो मैं अलार्म बंद करके फिर सो गया, दूसरी बार अलार्म 5:00 बजे बजा तो उठा और 5:30 बजते बजते जल्दी जल्दी नहा धोकर तैयार हुआ और ये सोचकर स्टेशन से बाहर गया कि कुछ खा-पी लिया जाये क्योकि ट्रेन पर का खाना मुझे बिलकुल पसंद नहीं है, यदि यहाँ नहीं खाया तो पूरे दिन बिना कुछ खाये ही रहना पड़ेगा। स्टेशन से बाहर जाकर भी निराशा ही हाथ लगी, एक चाय की दुकान तक नहीं खुली थी, इधर उधर देखा और कुछ दूर तक भी गया फिर भी कुछ खाने पीने के लिए नहीं मिला। एक कहावत है न कि अपना सा मुँह बना लेना, वही मेरे साथ हुआ, जिसे फुर्ती से मैं स्टेशन से बाहर चाय पीने गया था और कुछ न मिलने के कारण उसी फुर्ती से मुँह बना कर वापस आ गया। 

Saturday, May 6, 2017

बैजनाथ महादेव से पठानकोट (Baijnath to Pathankot)

बैजनाथ महादेव से पठानकोट 
(Baijnath to Pathankot)




इतने दिन से घूमते हुए अब वो घड़ी आ गयी जब हमें वापस जाना होगा। ज्वालादेवी, धर्मशाला, मैक्लोडगंज, भागसू नाग वाटर फॉल, चिंतपूर्णी देवी और बैजनाथ महादेव की यात्रा पूरी करके और कुछ खट्टी-मीठी यादें लेकर और कुछ को अपने कैमरे में कैद करके बुझे मन से वापसी की राह पकड़नी थी। बैजनाथ मंदिर देखने के बाद वहां से बस से हम पपरोला आ चुके थे। 

पपरोला बस स्टैंड से रेलवे स्टेशन की दूरी महज 100 मीटर ही है। मैं स्टेशन पंहुचा तो यहाँ का नज़ारा ऐसा लग रहा था जैसे हम किसी निर्जन प्रदेश में आ गए। स्टेशन के बाहर-भीतर और यहाँ तक प्लेटफार्म पर भी कोई मानव नहीं दिख रहा था, अरे मानव तो क्या कोई और जंतु भी दिख जाता तो लगता कि कुछ दिखा। अगर कुछ दिख रहा था यार्ड में खड़ी ट्रेन की 2 इंजन और ट्रेनें। मन तो कर रहा था कि स्टेशन के बोर्ड पर जो "बैजनाथ पपरोला" लिखा हुआ है उसे मिटाकर "निर्जन पपरोला" कर दें, पर ऐसा करना सरकारी संपत्ति का नुकसान करना होता, इसलिए नहीं लिखे। 

Thursday, May 4, 2017

बैजनाथ महादेव (Baijnath Mahadev), हिमाचल प्रदेश

बैजनाथ महादेव, पालमपुर
(Baijnath Mahadev, Palampur)

सबसे पहले आपको आज की योजना के बारे में बता दूँ। आज की मेरी योजना चिंतपूर्णी देवी से सीधे बैजनाथ जाने की है। साधन कुछ हो हो सकता है। चिंतपूर्णी देवी से ज्वालामुखी रोड तक बस से और वहां से ट्रेन से या फिर चिंतपूर्णी देवी से सीधे बैजनाथ तक बस से। उसके बाद 2:30 बजे वाली ट्रेन से बैजनाथ से पठानकोट और रात में पठानकोट में विश्राम और अगले दिन सुबह दिल्ली के लिए रवाना।

Tuesday, May 2, 2017

चिंतपूर्णी देवी (Chintpoorni Devi)

चिंतपूर्णी देवी (Chintpoorni Devi)




वैसे तो मुझे कहाँ जाना है इसके बारे में कोई योजना तो थी नहीं। बस जिधर मन हुआ उधर चले जाना था। पर फिर भी मैक्लोडगंज में बस पर बैठते ही मैंने चिंतपूर्णी देवी जाने का सोचा। इस समय 1:45 बजे थे।  बस चली और 2 :15 बजे हम धर्मशाला पहुँच गए।  वहां उतरे तो देखा कि ज्वाला देवी जाने के लिए एक बस जाने के लिए तैयार खड़ी है। मैं बस में घुसा और सबसे आगे की सीट पर बैठ गया। बस 2 मिनट में ही ज्वाला देवी के लिए चली।  कंडक्टर के आने पर मैंने उसे कहा कि मुझे चिंतपूर्णी देवी जाना है इसलिए आप मुझे काँगड़ा की टिकट दे दो, वहां से मैं दूसरी बस से चिंतपूर्णी देवी चला जाऊँगा। मेरी इस बात का उसने रुखा सा जवाब दिया कि काँगड़ा से चिंतपूर्णी देवी की बस नहीं मिलती है, इसी बस से आपको ज्वालादेवी जाना होगा फिर वहाँ से आपको चिंतपूर्णी देवी की बस मिलेगी।  फिर भी मैंने काँगड़ा का ही टिकट लिया कि जो होगा देखा जाएगा अगर बस नहीं मिली तो जहाँ रात होगी वहीं सो जाएंगे। खैर करीब 3 बजे हम काँगड़ा पहुंच गए।  वहां बस पर से ही एक बस दिखी जो चिंतपूर्णी देवी जा रही थी।  मैं इस बस से उतरा और उस बस में बैठ गया। 

Tuesday, April 25, 2017

भागसू नाग मंदिर और झरना (Bhagsu Naag Temple and Waterfall)

भागसू नाग मंदिर और झरना
(Bhagsu Naag Temple and Waterfall)


भागसू नाग मंदिर और झरना, मैक्लोडगंज (Bhagsu Naag Temple and Waterfall, McLeodganj)

काँगड़ा से धर्मशाला पहुंचकर बस से उतरने के बाद आने के बाद कुछ इधर उधर घूमा और फिर मैक्लोडगंज जाने वाली बस में जाकर बैठ गया। अभी 11 बजे थे। बस खुलने ही वाली थी। वैसे ये बस मैक्लोडगंज से आगे नड्डी गांव तक जा रही थी। नड्डी गांव गाड़ियों का अंतिम गंतव्य स्थल है इससे आगे कोई गाड़ी नहीं जाती। 11:30 बजे बस मैक्लोडगंज पहुँच गयी। हम बस से उतरकर बिना किसी से पूछे जिस और कुछ लोग जा रहे थे उधर ही चल दिए।  बस स्टैंड ऐसे बना हुआ था जैसे एक बड़ी से बिल्डिंग हो। मैं सीढिया चढ़कर ऊपर पहुँचा। वहीं बहुत सारी टैक्सियां खड़ी जो पर्यटकों के इंतज़ार में थी। ऐसा लग रहा था कि यही जगह मैक्लोडगंज का मुख्य बाजार है। पूरा चहल-पहल था।  यहीं से आगे तीन रास्ते थे।  मैं बिना किसी से कुछ पूछे ऐसे ही बीच वाली सड़क पर चलने लगा। बाजार पर करने के बाद रास्ता बेहद ही मनभावन और शांति लिए हुए था। दूर पैराग्लइडिंग करते हुए लोग दिख रहे थे। 

Tuesday, April 18, 2017

धर्मशाला : हिमाचल का गहना (Dharamshala)

धर्मशाला : हिमाचल का गहना (Dharamshala)


कल पूरे दिन के सफर की थकान और बिना खाये पूरे दिन रहने के बाद रात को खाना खाने के बाद जो नींद आयी वो एक ही बार 4:30 बजे मोबाइल में अलार्म बजने के साथ ही खुला। बिस्तर से उठकर जल्दी से मैं नहाने की तैयारी में लग गया। फटाफट नहा-धोकर तैयार हुआ और सारा सामान पैक किया। इतना करते करते 5 :30 बज गए। अब कल की योजना के मुताबिक एक बार फिर माँ ज्वालादेवी के दर्शन के लिए चल दिया। बाहर घुप्प अँधेरा था। इक्का-दुक्का लोग ही मंदिर के रास्ते पर मिल रहे थे। कुछ देर में हम मंदिर पहुँच गए। यहाँ मुश्किल से इस समय 25 -30 लोग ही थी। अभी मंदिर खुलने में कुछ समय था। कुछ देर में आरती आरम्भ हो गयी। आरती समाप्त होते होते मेरे पीछे करीब 300 से 400 लोगों की भीड़ जमा हो चुकी थी। आरती के बाद 6:30 पर मंदिर के कपाट खोल दिए गए। बारी बारी से श्रद्धालु एक एक करके मंदिर में प्रवेश कर रहे थे और दर्शन के बाद दूसरे दरवाजे से निकल रहे थे। 20 मिनट में मेरी बारी आयी तो मैंने भी एक बार फिर से दर्शन किये। 7 :00 बज चुके थे उसके बाद सीधा मैं गेस्ट हाउस आया और अपने बैग उठाकर नीचे आया। यहाँ से मुझे बस से ज्वालामुखी रोड जाना था उसके बाद वहां से ट्रेन से बैजनाथ जाना था।

Friday, April 14, 2017

ज्वालादेवी धाम (Jwaladevi Dham)

ज्वालादेवी धाम (Jwaladevi Dham)



ज्वालाजी मंदिर को ज्वालामुखी मंदिर भी कहते हैं ! ज्वालाजी मंदिर को भारत के 51 शक्तिपीठ में गिना जाता है ! लगभग एक टीले पर बने इस मंदिर की देखभाल का जिम्मा बाबा गोरखनाथ के अनुयायियों के जिम्मे है ! कहा जाता है की इसके ऊपर की चोटी को अकबर ने और शोभायमान कराया था ! इसमें एक पवित्र ज्वाला सदैव जलती रहती है जो माँ के प्रत्यक्ष होने का प्रमाण देती है ! ऐसा कहा जाता है कि माँ दुर्गा के परम भक्त कांगड़ा के राजा भूमि चन्द कटोच को एक सपना आया , उस सपने को उन्होंने मंत्रियों को बताया तो उनके बताये गए विवरण के अनुसार उस स्थान की खोज हुई और ये जगह मिल गयी , जहां लगातार ज्वाला प्रज्वलित होती है ! ये ही ज्वाला से इस मंदिर का नाम ज्वाला जी या ज्वालामुखी हुआ ! इस मंदिर में कोई मूर्ति नहीं है बल्कि प्राकृतिक रूप से निकलती ज्वाला की ही पूजा होती है ! एक आयताकार कुण्ड सा बना है जिसमें 2-3 आदमी खड़े रहते हैं !

Thursday, April 13, 2017

दिल्ली से हरिद्वार और श्रीनगर (Delhi to Haridwar and Srinagar)

दिल्ली से हरिद्वार और श्रीनगर
(Delhi to Haridwar and Srinagar)

पहला दिन 

यात्रा की सारी तैयारी हमलोगों ने पहले ही कर ली थी। 3 जून को मम्मी पापा का पटना से टिकट था और 4 जून को सुबह वो लोग दिल्ली पहुँच गए। उनकी ट्रेन आने से पहले ही मैं रेलवे स्टेशन पहुंच गया।  ट्रेन समय से आ गई। उनलोगों को लाने के बाद मैं अपने ऑफिस के लिए निकल गया। ऑफिस से 4 बजे ही निकल गया। घर आकर सारी तैयारीयों का जायजा लिया और फिर यात्रा की तैयारी में व्यस्त हो गया। हमारी हरिद्वार की ट्रेन पुरानी दिल्ली स्टेशन से रात्रि में 10:10 पर थी। सबका विचार था की घर से खाना खाकर 9 बजे निकला जाये। 9 बजे निकलने पर या तो मेट्रो या बस से से जाना पड़ता उसमें भी एक जगह बदलना पड़ता और 7 बजे वाली पैसेंजर ट्रेन से चले जाने पर न तो कही बदलने की समस्या न ही भीड़ में धक्का मुक्की। अंत में यही तय हुआ कि 7 बजे ही निकला जाये और स्टेशन पर ही खाना खाया जाये।  

Monday, April 10, 2017

काँगड़ा वैली ट्रेन यात्रा (Kangra Valley Train Journey)

काँगड़ा वैली ट्रेन यात्रा (Kangra Valley Train Journey)



पठानकोट से ज्वालामुखी रोड (Pathankot to Jwalamukhi Road)

पठानकोट में ट्रेन से उतरने के बाद टिकट लेकर और कुछ फोटो खीचने के बाद मैं सीधा प्लेटफार्म 4 पर चला गया। अभी सुबह के 8 :45 बजे थे। वहां पहले से ही एक ट्रेन लगी थी। मैंने गार्ड से पूछा तो उसने बताया कि ये तो अभी आयी ही है। ये ट्रेन यार्ड में जाएगी और जो जाएगी वो कुछ देर में यहाँ लगा दी जाएगी। मैं पहली बार इतनी छोटी ट्रेन देख रहा था। ट्रेन की पटरियों की चौड़ाई बहुत ही कम थी। देखकर मन प्रफुल्लित हो रहा था। बस जल्दी से ट्रेन में बैठ जाने का मन रहा था। वहीं पर एक चाय की दुकान थी मैंने एक कप चाय लिया और पीने लगा। मेरी चाय ख़त्म होने से पहले ही पहले वहां खड़ी ट्रेन को एक इंजन खीचकर यार्ड की तरफ ले गया। यार्ड में खड़ी दूसरी ट्रेन प्लेटफार्म पर लगा दी गयी। मैं जल्दी से ट्रेन में घुसा और खिड़की के पास वाली सीट पर बैठ गया। 

Thursday, April 6, 2017

दिल्ली से पठानकोट (Delhi to Pathankot)

दिल्ली से पठानकोट (Delhi to Pathankot)



आख़िरकार इंतज़ार ख़तम हुआ और यात्रा की तिथि आ ही गयी। ट्रेन पुरानी दिल्ली (दिल्ली जंक्शन) से रात 11:45 पर थी। रोज तो ऑफिस से मैं करीब 8 बजे आता था। आज जाना था इसलिए ऑफिस से 6 बजे ही निकल गया। करीब 6:30 बजे मैं घर पहुँच गया। अब तक कंचन पैकिंग का सारा काम कर चुकी थी। मुझे 4 दिन बाहर रहना था इसी हिसाब उसे उसने इतना खाने-पीने का सामान दे दिया था कि इतने में बिना कहीं किसी होटल में खाना खाये भी मेरा गुजारा हो जाये। 


9:15 बजे मैं घर से निकला और सीधा मेट्रो स्टेशन पहुँच गया। मेट्रो में जो भीड़ होती है उसके कारण मुझे मेट्रो से कहीं भी आना जाना पसंद नहीं है पर ये सोचकर कि रात ज्यादा हो गयी है तो भीड़ कुछ कम मिलेगी इसलिए मेट्रो से जाने का इरादा किया और मेरा ये अंदाज़ सही निकल जब प्लेटफार्म पर पहुंचे तो कुछ ही लोग थे और जो मेट्रो आयी भी वो भी 8 कोच की जिसके कारण मेट्रो के अंदर भीड़ ज्यादा नहीं हो सकी। पर जैसे जैसे स्टेशन आ रही थी मेट्रो के अंदर भीड़ बढ़ती जा रही थी और उसका कारण एक ही था कि हरेक स्टेशन पर चढ़ने वाले यात्री तो थे पर उतरने वाले यात्री एक भी नहीं थे। इसी तरह बाराखंभा रोड स्टेशन आते आते भीड़ इतनी हो गयी कि अब खड़े होने मुश्किल हो रहा था। अब मन में मैं बस यही सोच रहा था कि काश मैं ऑटो से आ जाता तो ये गति नहीं होती हमारी। 

Tuesday, April 4, 2017

काँगड़ा में कुछ दिन (Some days in Kangra)-2017

काँगड़ा में कुछ दिन (Some days in Kangra)-2017



बेटे की परीक्षा 10 मार्च को खत्म होने के बाद 11 मार्च का पत्नी और बेटे का पटना जाने का टिकट था और मेरा टिकट 17 मार्च को था और वापसी की टिकट सब लोगो की 20 मार्च की थी।  मैंने ऑफिस से छुट्टी भी ले ली थी। पर जाने के एक दिन पहले  सारी योजना धरी की धरी रह गयी।  पत्नी ने वहां जाने से मना कर दिया कि अब वहां गर्मी की छुट्टियों में जाऊँगी। बेटे ने भी अपनी माँ का पक्ष लेते हुए जाने से मना कर दिया। उन लोगों के मना कर देने के बाद मेरे सामने के एक बड़ा धर्मसंकट आ गया क्योकि मैं अपने ऑफिस से भी छुट्टी ले चुका था। छुट्टी लेने के बाद ऑफिस जाना भी अच्छा नहीं लग रहा था और घर में रहना भी उचित नहीं था। बहुत सोचने के बाद मैं ज्वाला देवी और और बैजनाथ महादेव जाने की योजना योजना बनाई। यहाँ भी जाने से पत्नी और बेटे ने मना कर दिया और कहा कि इस बार आप अकेले ही चले जाइये हम दोनों फिर कभी बाद में जायेगे जब माँ-पिताजी साथ में होंगे।  

Wednesday, March 22, 2017

बदरीनाथ : एक अदभुत अहसास

बदरीनाथ : एक अदभुत अहसास


वैसे तो पूरा उत्तराखंड ही देव भूमि कहा जाता है। उत्तराखंड का हिन्दू संस्कृति और धर्म में महत्वपूर्ण स्थान है। यहां गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ जैसे कई सिद्ध तीर्थ स्थल हैं। पूरे देश में में भगवान विष्णु के हज़ारों मंदिर हैं परन्तु उत्तराखंड स्थित पंच बदरी सर्वोपरि हैं। बदरीनाथ को चारधामों में से एक माना जाता है। मुझे भी इस धाम पर जाने और वहाँ एक दिन बिताने का सौभग्य मिला। 

समुद्र  के तल से लगभग 3133 मीटर की ऊंचाई पर बदरीनाथ धाम स्थित है। माना जाता है कि शंकराचार्य ने आठवीं शताब्दी में इसका निर्माण कराया था। वर्तमान में शंकराचार्य की निर्धारित परंपरा के अनुसार उन्हीं के वंशज नंबूदरीपाद ब्राह्मण भगवान बदरीविशाल की पूजा-अर्चना करते हैं। बदरीनाथ की मूर्ति शालग्रामशिला से बनी हुई, चतुर्भुज ध्यान मुद्रा में है। कहा जाता है कि यह मूर्ति देवताओं ने नारदकुण्ड से निकालकर स्थापित की थी। सिद्ध, ऋषि, मुनि इसके प्रधान अर्चक थे। जब बौद्धों का प्राबल्य हुआ, तब उन्होंने इसे बुद्ध की मूर्ति मानकर पूजा आरम्भ की। शंकराचार्य की प्रचार यात्रा के समय बौद्ध तिब्बत भागते हुए मूर्ति को अलकनन्दा में फेंक गए। शंकराचार्य ने अलकनन्दा से पुन: बाहर निकालकर उसकी स्थापना की। तदनन्तर मूर्ति पुन: स्थानान्तरित हो गयी और तीसरी बार तप्त कुण्ड से निकालकर रामानुजाचार्य ने इसकी स्थापना की।

Friday, March 17, 2017

वैष्णो देवी यात्रा (Journey of Vaishno Devi)-2016


वैष्णो देवी यात्रा (2016)



वैसे तो वैष्णो देवी की ये मेरी चौथी यात्रा है। इस बार भी पिछले साल की तरह नवरात्रों में अकेले जाने का प्लान किया। टिकट जून में ही बुक कर लिया था।  जाने का टिकट 8 अक्टूबर का और आने का 10 अक्टूबर का संपर्क क्रांति से बुक किया।  जाने से 6-7 दिन पहले अपने ऑफिस में कई लोगो को पूछा पर कोई भी जाने के लिए तैयार नहीं हुआ। अंत में मैंने यही सोचा कि इस बार भी अकेले ही जाएंगे। अब पता नहीं क्यों कोई चलने के लिए तैयार नहीं हो रहे थे ये तो वो लोग ही जानते होंगे। मैंने लोगो को ये भी समझाया कि आप लोगो को ऑफिस से कोई छुट्टी नहीं लेनी पड़ेगी।  शनिवार को ऑफिस के बाद हम लोग रात में जायेगे, फिर रविवार, सोमवार और मंगलवार तीन दिन की छुट्टी है। जाने से दो दिन पहले एक बार फिर मैंने लोगो से पूछना शुरू किया कि कोई वैष्णो देवी चलेगे तो चलिए और इसी क्रम में मृणाल नाम के एक सहकर्मी से जैसे ही मैंने पूछा तो बिना एक पल देर किये उन्होंने जाने के लिए हामी भर दी। वैसे टिकट बुक करवाते समय मैंने उनसे पूछा तो उन्होंने मना कर दिया था इसलिए उनसे मैं नहीं पूछ रहा था।  पर आज उन्होंने हां कर दिया।  अब जब उन्होंने हां कर दिया तो उनके लिए टिकट भी चाहिए।  खैर जो भी हो टिकट भी तत्काल से बुक कर लिया गया।

Tuesday, March 14, 2017

राजगीर (राजगृह, Rajgir)

राजगीर (राजगृह, Rajgir)


राजगीर जाने का प्लान कल नालन्दा में घूमते हुए ही तय हो गया था। बात ये तय हुई थी कि सुबह 6 बजे तक राजगीर के लिए निकल जाना है। 2 दिन का भारतीय रेल का सफर, 1 दिन शादी समारोह और 1 दिन नालंदा घूमते हुए कुल मिलाकर 4 दिन की जो थकान थी उसके कारण ऐसी गहरी नींद आयी कि हम लोग 6 बजे तक सोते ही रह गए। 6 बजे जागने के बाद हम लोग जल्दी जल्दी ब्रश किये और एक बैग में कपडे रखे और निकल गए। नहाने का प्लान तो राजगीर के गरम कुंड में ही था। 6:30 बजे घर से निकले और एक ऑटो में बैठकर बस स्टैंड आ गए। बिहार शरीफ से राजगीर की दूरी 25 किलोमीटर है और यहाँ से राजगीर के लिए हर 5 मिनट में बस मिल जाती है। बस स्टैंड आया तो राजगीर के लिए एक बस खुलने के लिए तैयार थी। कुछ सीटें भर चुकी थी और कुछ खाली थी। हम तीनों बस में बैठ गए। वही तीन प्राणी आज भी थे जो कल नालंदा में भटक रहे थे। 

Tuesday, February 21, 2017

नालन्दा (Nalanda)

नालन्दा (Nalanda)
कुछ बातें नालंदा के गौरवशाली इतिहास के बारे में

नालंदा भारत के बिहार प्रान्त का एक जिला है जिसका मुख्यालय बिहार शरीफ है।। नालंदा अपने प्राचीन इतिहास के लिये विश्वप्रसिद्ध है। यहाँ विश्व के सबसे पुराने नालंदा विश्वविद्यालय के अवशेष आज भी मौज़ूद है, जहाँ सुदूर देशों से छात्र अध्ययन के लिये भारत आते थे।

बुद्ध और महावीर कई बार नालन्दा मे ठहरे थे। माना जाता है कि महावीर ने मोक्ष की प्राप्ति पावापुरी में की थी, जो नालन्दा मे स्थित है। बुद्ध के प्रमुख छात्रों मे से एक, सारिपुत्र का जन्म नालन्दा मे हुआ था।

नालंदा पूर्व में अस्थामा और सरमेरा, पश्चिम में तेल्हारा, दक्षिण में गिरियक तथा उत्तर में हरनौत तक फैला है। 

Thursday, February 16, 2017

वैष्णो देवी यात्रा (Journey of Vaishno Devi)-2015


वैष्णो देवी यात्रा (2015)


दो बार वैष्णो देवी जाने के बाद फिर से मेरा मन एक बार और वहां जाने का करने लगा। पिछले वर्ष वहां मैं नवरात्रों में गया था इलसिए इस बार भी मैंने नवरात्रों में ही जाने का प्लान किया। अपने ऑफिस और जान पहचान के लोगों से जाने के बारे में पूछा  लेकिन कोई भी वहां जाने के लिए तैयार नहीं हुआ।  अंत में मैंने अकेले ही जाने का मन बनाया।  स्कूल में छुट्टियां नहीं होने के करना पत्नी और बच्चे भी साथ नहीं जा सकते थे। उस समय दिल्ली से कटरा जाने वाली एकलौती ट्रेन श्री शक्ति एक्सप्रेस ही थी जो कटरा तक जाती थी पर उसकी टाइमिंग नई दिल्ली स्टेशन से शाम को 5 :30 पर थी इसलिए उस ट्रेन की टिकट नहीं लिया क्योकि उस ट्रेन का टिकट लेने पर ऑफिस से हाफ डे की छुट्टी लेनी पड़ती इसलिए मैंने दिल्ली से जम्मू तक का टिकट उत्तर संपर्क क्रांति एक्सप्रेस से लिया। जम्मू से कटरा तक या तो बस या पैसेंजर ट्रेन से जाने का प्लान किया। आने के लिए मैं श्री शक्ति एक्सप्रेस टिकट लिया क्योकि वो रात में 11 बजे कटरा से चलती है। कटरा में ठहरने के लिए आई आर सी टी सी का ही गेस्ट हाउस बुक किया जो कटरा रेलवे स्टेशन की पहली मंज़िल पर स्थित है।

Monday, January 16, 2017

वैष्णो देवी यात्रा (Journey of Vaishno Devi) 2014-2


वैष्णो देवी यात्रा (2014)-2



एक बार फिर वैष्णो देवी (वैष्णो देवी की दूसरी यात्रा)
जून 2014 में वैष्णो देवी यात्रा से आने के बाद पत्नी और बेटा गांव चले गए। 10 दिन मैं उन लोगों को लाने के लिए गया क्योंकि गरमी की छुट्टियों के बाद स्कूल खुलने वाली थी। वहां जाने पर माताजी ने कहा कि तुम लोग तो वैष्णो देवी से आ गए पर अगर अगली बार जाओगे हम लोग भी चलेंगे। मैंने कहा ठीक है अगली बार सब लोग जाएंगे। बात यहीं पर ख़तम हो गयी।

मैं पत्नी और बेटे के साथ दिल्ली आ गया। 14 जुलाई को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दिल्ली से कटरा तक जाने वाली पहली ट्रेन का उद्घाटन किया। हम टीवी पर यही न्यूज़ देख ही रहे थे कि कंचन ने कहा कि देखिये हम लोग 1 महीने पहले वैष्णो देवी गए थे तो ट्रेन वहां तक नहीं जाती थी लेकिन अब ट्रेन सीधे कटरा तक चली जाएगी तो क्यों न आने वाली नवरात्रि में मम्मी और पापा को आप वैष्णो देवी ले जाएँ। मैंने कहा कि आईडिया तो ठीक है पर इतनी जल्दी जाने के लिए ऑफिस से छुट्टी लेना मुश्किल है क्योंकि अभी हम लोग वैष्णो देवी गए तो छुट्टी लिए और उसके बाद अभी तुम लोगो को गांव से लाने गए तो छुट्टी लिए फिर छुट्टी लेना मुश्किल है।

Monday, January 9, 2017

केदारनाथ कैसे जाएँ (How to reach Kedarnath)

 केदारनाथ : अद्भुत, अविश्सनीय, अकल्पनीय 

वैसे तो पूरा उत्तराखंड ही देव भूमि कहा जाता है। उत्तराखंड का हिन्दू संस्कृति और धर्म में महत्वपूर्ण स्थान है। यहां गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ जैसे कई सिद्ध तीर्थ स्थल हैं। सारी दुनिया में भगवान शिव के करोड़ों मंदिर हैं परन्तु उत्तराखंड स्थित पंच केदार सर्वोपरि हैं। भगवान शिव ने अपने महिषरूप अवतार में पांच अंग, पांच अलग-अलग स्थानों पर स्थापित किए थे। जिन्हें मुख्य केदारनाथ पीठ के अतिरिक्त चार और पीठों सहित पंच केदार कहा जाता है। इस लेख में अभी हम केवल केदारनाथ और पंच केदार की बात करेंगे।  बाकी जगहों की बातें बाद में दूसरे लेख में करेंगे। इस लेख में दिए गए सारे फोटो मेरे द्वारा लिए गए हैं जब मैं केदारनाथ की यात्रा पर गया था।  जो फोटो मेरी नहीं है मैंने उसके आगे लिख दिया है कि फोटो कहाँ से लिया गया है। 

Thursday, January 5, 2017

दिल्ली से आगरा (Delhi to Agra)

दिल्ली से आगरा 



2 जून 2013 (रविवार)
बहुत दिनों से ताजमहल देखने का मन हो रहा था। आख़िरकार 2 जून 2013 को ताजमहल देखने की प्लानिंग हुई।  मैं, मेरी पत्नी, बेटा, ऑफिस के ही एक सहकर्मी (नरेंद्र), उनकी पत्नी, उनकी बेटी और बेटा, एवं ऑफिस के ही दुसरे सहकर्मी (राजीव) मिलकर हम 8 लोग हो गए। दिल्ली से आगरा जाने और आने का हमने ताज एक्सप्रेस (ट्रेन संख्या 12280 डाउन) का टिकट बुक किया और वापसी का टिकट भी ताज एक्सप्रेस (ट्रेन संख्या 12279 अप) का ही लिया।




एक दिन का टूर था इसलिए कोई ज्यादा तैयारी करने की कोई जरूरत नहीं थी।  बस दिन के खाने के लिए कुछ बनाकर ले लेना था।  यात्रा वाले दिन हम लोग 4 बजे ही उठ गए थे  जल्दी से कुछ खाना बनाकर पैक किया गया और नहा धोकर हम लोग  तैयार हो गए।  ताज एक्सप्रेस हजरत निजामुद्दीन से 7 बजे चलती है और आगरा 9:40 पर पहुँचती है। 7 बजे की ट्रेन थी तो हमने 5 : 30 घर से निकल गए और जिन लोगों जाना था वे लोग भी अपने अपने घर से निकल चुके थे।  बात हुई की बस स्टॉप पर मिलते हैं और से ऑटो में बैठेंगे।  बस स्टॉप पर आकर हमने 2 ऑटो किया।  एक ऑटो में नरेंद्र जी अपने परिवार के साथ  बैठे और दूसरे ऑटो में हम अपने परिवार के साथ बैठे।  नरेंद्र जी 4 लोग थे तो वो सब एक ऑटो में और हम 3 लोग थे और एक राजीव जी थे तो 4 लोग एक ऑटो में बैठ गए।

वैष्णो देवी यात्रा (Journey of Vaishno Devi) 2014-1

वैष्णो देवी यात्रा-1 (2014)




बहुत दिनों सो सोच रहा था वैष्णो देवी यात्रा पर जाने का पर समय ही नहीं निकाल पा रहा था।  कभी बच्चे के स्कूल में छुट्टी नहीं मिलती और स्कूल में छुट्टी मिलती तो मुझे नहीं मिल पाती।  पर साल 2014 के आरम्भ में ही सोच लिया था कि चाहे कुछ  हो इस बार गर्मी की छुट्टियों में वैष्णो देवी जरूर जाऊँगा।  जून में जाने की प्लानिंग किया। टिकट अप्रैल में बुक करवाना होगा। टिकट बुक करने से पैरेंट्स को जाने के लिए कहा तो उन लोगों ने मना कर दिया कि उस समय रिस्तेदारों में बहुत सारी शादियां होती है तो वहां भी जाना पड़ता है, इलसिए तुम लोग चले जाओ हम लोग कभी बाद में जाएंगे। पेरेंट्स के मना करने पर मैं अपना, पत्नी और बेटे का टिकट बुक करना था। मैंने अप्रैल में ही टिकट ऑनलाइन 3  टिकट बुक किया।  दिल्ली से  जम्मू के लिए उत्तर संपर्क क्रांति एक्सप्रेस (ट्रेन संख्या 12445) और आने का टिकट जम्मू-दिल्ली सराय रोहिल्ला दुरंतो एक्सप्रेस (ट्रेन संख्या 12266) का ऑनलाइन टिकट (www.irctc.co.in) बनाया। आज ट्रेनें सीधे कटरा तक जाती है पर उस समय ट्रेन जम्मू या उधमपुर तक ही जाती थी। जम्मू से कटरा तक 2 घंटे  सफर बस से करना पड़ता था। ट्रेनें भले कटरा  तक नहीं जा रही थी पर कटरा में स्टेशन बनकर तैयार था अगर किसी चीज़ की देर  थी वहां तक ट्रेन के पहुँचने में तो माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उद्घाटन की। मेरी वहां की यात्रा के एक महीने बाद ही 14 जुलाई से कटरा तक ट्रेन जाने लगी थी और वह ट्रेन श्री शक्ति एक्सप्रेस (ट्रेन संख्या 22461 अप दिल्ली से कटरा और 22462 डाउन कटरा से दिल्ली) थी। कटरा में रहने के लिए मैंने कटरा रेलवे स्टेशन पर ही रेलवे का ही गेस्ट हाउस बुक किया जो ऑनलाइन (www.irctctourism.com/) ही बुक  होता है और वापसी  में दिन में रुकने के लिए जम्मू रेलवे स्टेशन पर रिटायरिंग रूम बुक किया।

रघुनाथ मंदिर, जम्मू (Raghunath Temple, Jammu)

इस यात्रा-वृत्तांत को आरम्भ से पढ़ने के लि यहाँ क्लिक करें। 


रघुनाथ मंदिर, जम्मू


रघुनाथ मंदिर के बारे में 

रघुनाथ मंदिर का निर्माण 1857 में महाराजा रणवीर सिंह और उनके पिता महाराजा गुलाब सिंह द्वारा करवाया गया था। इस मंदिर में 7 ऐतिहासिक धार्मिक स्‍थल मौजूद है। मंदिर के आन्‍तरिक हिस्‍सों में सोना लगा हुआ है जो तेज का स्‍वरूप है। मंदिर में कई देवी और देवताओं की मूर्ति लगी हुई है। इस मंदिर में हिंदू धर्म के 33 करोड़ देवी और देवताओं की लिंगम भी बने है जो मंदिरों में एक इतिहास है। श्रद्धालुओं को यहां आकर काफी आश्‍चर्य होता है।

  • यह मन्दिर आकर्षक कलात्मकता का विशिष्ट उदाहरण है।
  • रघुनाथ मंदिर भगवान राम को समर्पित है।
  • यह मंदिर उत्तर भारत के सबसे प्रमुख एवं अनोखे मंदिरों में से एक है।
  • इस मंदिर को सन् 1835 में इसे महाराज गुलाब सिंह ने बनवाना शुरू किया पर निर्माण की समाप्ति राजा रंजीत सिंह के काल में हुई।
  • मंदिर के भीतर की दीवारों पर तीन तरफ से सोने की परत चढ़ी हुई है।
  • इसके अलावा मंदिर के चारों ओर कई मंदिर स्थित है जिनका सम्बन्ध रामायण काल के देवी-देवताओं से हैं।
  • रघुनाथ मन्दिर में की गई नक़्क़ाशी को देख कर पर्यटक एक अद्भुत सम्मोहन में बंध कर मन्त्र-मुग्ध से हो जाते हैं।

Tuesday, January 3, 2017

केदारनाथ (Kedarnath)

केदारनाथ (Kedarnath)

चौथा दिन

सुबह के 3 बजते ही मोबाइल का अलार्म बजना शुरू हो गया। नींद पूरी हुई नहीं थी इसलिए उठने का मन बिलकुल नहीं हो रहा था।  सब लोगों को जगाकर मैं एक बार फिर से सोने की असफल कोशिश करने लगा।जून के महीने में भी ठण्ड इतनी ज्यादा थी कि रजाई से बाहर निकलने का मन नहीं हो रहा था। 5 बजे तक हम लोगों को तैयार होकर गेस्ट हाउस से केदारनाथ के लिए निकल जाना था इसलिए ना चाहते हुए भी इतनी ठण्ड में रजाई से निकलना ही था। पहले तो पिताजी और बेटे नहाने गए। उसके बाद माताजी और पत्नी की बारी आयी। मेरा मन गरम पानी के झरने में नहाने का करने लगा पर हिम्मत नहीं हो रही थी कि बाहर निकलें। कमरे के अंदर का तापमान जब 5 डिग्री के करीब था तो सोचिये बाहर का तापमान कितना होगा। फिर मैं टॉर्च और एक टॉवेल लिया और पिताजी को ये बोलकर कि मैं कुछ देर में आता हूँ और तेज़ी से कमरे से निकल गया। बाहर निकलते ही ठण्ड ने अपना असर दिखाया। ऐसा लग रहा था कि मैं किसी बर्फ से भरे  किसी टब में हूँ। मैं दौड़ता हुआ गेस्ट हाउस की 50 सीढियाँ उतर गया। हर तरफ सन्नाटा पसरा हुआ था। उस सन्नाटे में मन्दाकिनी नदी की पानी के बहने की जो आवाज़ थी बहुत ही मधुर लग रही थी। मन्दाकिनी की आवाज ऐसे लग रही थी जैसे कोई संगीत की धुन हो। मैं सीढ़ियों से उतरने के बाद मन्दाकिनी की तरफ गया और देखने लगा की गरम पानी का झरना किधर है।

श्रीनगर (गढ़वाल) से गौरीकुण्ड (Srinagar to Gaurikund)

श्रीनगर (गढ़वाल) से गौरीकुण्ड (Srinagar to Gaurikund)

तीसरा दिन
आज हमें श्रीनगर से रुदप्रयाग हुए होते हुए गौरीकुंड तक जाना था और गौरीकुंड में ही रात्रि विश्राम करना था।सुबह हम लोग 3 बजे ही जाग गए। कल की थकान के कारण आज उठने का मन नहीं कर रहा था फिर भी किसी तरह उठा और नहाने गए तो पानी बहुत ठंडा था फिर भी हम लोग नहाये सामान पैक किया और 5 बजे गेस्ट हाउस से बाहर आ गए। बाहर आते ही एक जीप मिली वो रुद्रप्रयाग तक जा रही थी हम लोग उसमें बैठ गए। 6 बजे हम लोग रुद्रप्रयाग पहुँच गए।  जीप वाले ने हमसे 5 लोगों के 150 रुपए लिया। मौसम बिलकुल ठंडा था।  कहाँ दिल्ली में 40 से 40 डिग्री तापमान और यहाँ इतनी ठण्ड। रुद्रप्रयाग पहुँचते पहुँचते बेटा ठण्ड से काँपने लगा था। यहाँ जीप से उतरते ही सबसे पहले उसे जैकेट पहनाया गया। रुद्रप्रयाग में जहाँ हम जीप से उतरे वहां पर बहुत साड़ी जीपें खड़ी थी। कुछ जीप गुप्तकाशी जा रही थी, कुछ कर्णप्रयाग, कुछ चमोली, कुछ उखीमठ। यहाँ से कोई भी जीप सीधे सोनप्रयाग तक नहीं जा रही थी, जो भी जा रही थी गुप्तकाशी तक और गुप्तकाशी से फिर दूसरी जीप से सोनप्रयाग।  मैं गुप्तकाशी जाने वाली एक जीप में बैठने ही वाला था कि एक बस पर नज़र पड़ी जो सीधे सोनप्रयाग जा रही थी। हम बस में जाकर बैठ गए। 7 बजे बस खुली और रुद्रप्रयाग बाजार पर करने के बाद मैंने देखा की वह से सड़क दो तरफ जाती है। एक सड़क बदरीनाथ और दूसरी केदारनाथ। रुद्रप्रयाग में अलकनन्दा और मन्दाकिनी का संगम है। मन्दाकिनी केदारनाथ से आती है और अलकनन्दा बदरीनाथ से आती है। यहाँ दोनों मिलकर इससे आगे देवपरयाग तक अलकनन्दा के नाम से ही जानी जाती है।रुद्रप्रयाग बाजार पार करने के बाद बस केदारनाथ के रास्ते पर चल पड़ी। रुद्रप्रयाग से सोनप्रयाग तक का बस का एक आदमी का किराया 100 रुपए है। सड़क इतनी खतरनाक  कि देखकर ही जान निकल जाती।  सड़क पर बस दौड़ी चली जा रही थी।

Saturday, December 31, 2016

केदारनाथ के खूबसूरत दृश्य

केदारनाथ के खूबसूरत दृश्य


प्रकृति के खूबसूरत नज़ारे 

केदारनाथ में प्रकृति के खूबसूरत दृश्य भी बहुत हैं।  जो तस्वीरें मैं यहाँ दे रहा हूँ ये तो कुछ भी नहीं है, वहां और भी ऐसे सुहाने दृश्यों की कोई कमी नहीं है।  इन दृश्यों को देखकर आप यहाँ से आना नहीं चाहेंगे, बस इनको देखते रहने का मन करेगा। कल कल करती बहती मन्दाकिनी, बर्फ से ढँके पहाड़, हरे भरे पेड़ पौधे, पहाड़ से गिरते झरने।  जो कुछ मैं अपने कैमरे में कैद कर सका उसे यहाँ दे रहा हूँ।

माणा : भारत का आखिरी गांव (Maana: Last Village of India)

बदरीनाथ से माणा गांव 


माणा गांव एक नजर में 

बदरीनाथ से तीन किमी आगे भारत का आखिरी गांव माणा सांस्कृतिक विरासत और अपनी अनूठी परंपराओं के लिए खासा महत्वपूर्ण है। लेकिन इससे भी ज्यादा यहां की प्राकृतिक सुंदरता देश विदेश के पर्यटकों के अपनी ओर खींचती है। मांणा गांव समुद्र तल से 10,200 फुट की ऊंचाई पर बसा है। भारत-तिब्बत सीमा से लगे यह गांव अपनी अनूठी परम्पराओं के लिए भी खासा मशहूर है। यहां रडंपा जनजाति के लोग निवास करते हैं। पहले बद्रीनाथ से कुछ ही दूर गुप्त गंगा और अलकनंदा के संगम पर स्थित इस गांव के बारे में लोग बहुत कम जानते थे लेकिन अब सरकार ने यहां तक पक्की सड़क बना दी है। इससे यहां पर्यटक आसानी से आ जा सकते हैं, और इनकी संख्या भी पहले की तुलना में अब काफी बढ़ गई है। भारत की उत्तरी सीमा पर स्थित इस गांव के आसपास कई दर्शनीय स्थल हैं जिनमें व्यास गुफा, गणेश गुफा, सरस्वती मन्दिर, भीम पुल, वसुधारा आदि मुख्य हैं। मांणा में कड़ाके की सर्दी पड़ती है। छह महीने तक यह क्षेत्र केवल बर्फ से ही ढका रहता है। यही कारण है कि यहां कि पर्वत चोटियां बिल्कुल खड़ी और खुष्क हैं। सर्दियां शुरु होने से पहले यहां रहने वाले ग्रामीण नीचे स्थित चमोली जिले के गांवों में अपना बसेरा करते हैं। शायद ही कोई ऐसा पर्यटक होगा जो बद्रीनाथ धाम से 3 किलोमीटर आगे इस दुकान पर लगे ‘भारत की आखिरी चाय की दुकान’ के बोर्ड के सामने फोटो न खिंचवाता हो. इस बोर्ड पर अंग्रेजी और हिन्दी सहित 10 भारतीय भाषाओं में लिखा है ‘भारत की आखिरी चाय की दुकान में आपका हार्दिक स्वागत है'.

बदरीनाथ (Badrinath)

बदरीनाथ (Badrinath)

बदरीनाथ  के बारे में 
बदरीनाथ भारत के उत्तरी भाग में स्थित एक स्थान है जो हिन्दुओं का प्रसिद्ध तीर्थ है। यह उत्तराखण्ड के चमोली जिले में स्थित एक नगर पंचायत है। यहाँ बद्रीरीनाथ मन्दिर है जो हिन्दुओं के चार प्रसिद्ध धामों में से एक है। बदरीनाथ जाने के लिए तीन ओर से रास्ता है रानीखेत से, कोटद्वार होकर पौड़ी (गढ़वाल) से ओर हरिद्वार होकर देवप्रयाग से। ये तीनों रास्ते रूद्वप्रयाग में मिल जाते है। रूद्रप्रयाग में मन्दाकिनी और अलकनन्दा का संगम है। जहां दो नदियां मिलती है, उस जगह को प्रयाग कहते है। बदरी-केदार की राह में कई प्रयाग आते है। रूद्रप्रयाग से जो लोग केदारनाथ जाना चाहतें है, वे उधर चले जाते है। भारत के प्रसिद्ध चार धामों में द्वारिका, जगन्नाथपुरी, रामेश्वर व बदरीनाथ आते है. इन चार धामों का वर्णन वेदों व पुराणौं तक में मिलता है. चार धामों के दर्शन का सौभाग्य पूर्व जन्म पुन्यों से ही प्राप्त होता है. इन्हीं चार धामों में से एक प्रसिद्ध धाम बद्रीनाथ धाम है. बद्रीनाथ धाम भगवान श्री विष्णु का धाम है. बद्रीनाथ धाम ऎसा धार्मिक स्थल है, जहां नर और नारायण दोनों मिलते है. धर्म शास्त्रों की मान्यता के अनुसार इसे विशालपुरी भी कहा जाता है. और बद्रीनाथ धाम में श्री विष्णु की पूजा होती है. इसीलिए इसे विष्णुधाम भी कहा जाता है. यह धाम हिमालय के सबसे पुराने तीर्थों में से एक है. मंदिर के मुख्य द्वार को सुन्दर चित्रकारी से सजाया गया है. मुख्य द्वार का नाम सिंहद्वार है. बद्रीनाथ मंदिर में चार भुजाओं वली काली पत्थर की बहुत छोटी मूर्तियां है. यहां भगवान श्री विष्णु पद्मासन की मुद्रा में विराजमान है. बद्रीनाथ धाम से संबन्धित मान्यता के अनुसार इस धाम की स्थापना सतयुग में हुई थी. यहीं कारण है, कि इस धाम का माहात्मय सभी प्रमुख शास्त्रों में पाया गया है. इस धाम में स्थापित श्री विष्णु की मूर्ति में मस्तक पर हीरा लगा है. मूर्ति को सोने से जडे मुकुट से सजाया गया है. यहां की मुख्य मूर्ति के पास अन्य अनेक मूर्तियां है. जिनमें नारायण, उद्ववजी, कुबेर व नारदजी कि मूर्ति प्रमुख है. मंदिर के निकट ही एक कुंड है, जिसका जल सदैव गरम रहता है. बद्रीनाथ धाम भगवान श्री विष्णु का धाम है, इसीलिए इसे वैकुण्ठ की तरह माना जाता है. यह माना जाता है, कि महर्षि वेदव्याज जी ने यहीं पर महाभारत और श्रीमदभागवत महान ग्रन्थों की रचना हुई है. यहां भगवान श्री कृ्ष्ण को केशव के नाम से जाना जाता है. इसके अतिरिक्त इस स्थान पर क्योकि देव ऋषि नारद ने भी तपस्या की थी. देव ऋषि नारद के द्वारा तपस्या करने के कारण यह क्षेत्र शारदा क्षेत्र के नाम से प्रसिद्ध है. यहां आकर तपस्या करने वालों में उद्वव भी शामिल है. इन सभी की मूर्तियां यहां मंदिर में रखी गई है. मंदिर के निकट ही अन्य अनेक धार्मिक स्थल है. जिसमें नारद कुण्ड, पंचशिला, वसुधारा, ब्रह्माकपाल, सोमतीर्थ, माता मूर्ति,शेष नेत्र, चरण पादुका, अलकापुरी, पंचतीर्थ व गंगा संगम.

Monday, December 26, 2016

केदारनाथ यात्रा : तैयारियां और जानकारियां

केदारनाथ यात्रा : तैयारियां और जानकारियां



मैं न तो कोई लेखक हूँ और न ही लेखक बनने की कोई इच्छा रखता हूँ। बस अपनी यादों को संभाल कर रखने के लिए मैं ये ब्लॉग लिख रहा हूँ। मेरा ये ब्लॉग पढ़कर आप ऐसा महसूस करेंगे जैसे ये यात्रा मैंने नहीं आप खुद ही किये हैं। इसमें जो भाषा और शैली मैंने प्रयोग किया है उससे आपको बिलकुल अपनेपन का अहसास होगा।अपने इस ब्लॉग में मैं केदरनाथ और बद्रीनाथ यात्रा के बारे में आपको बताऊंगा। वहाँ जाने से पहले मैंने इंटरनेट पर केदारनाथ के बारे में बहुत खोजबीन की पर कोई ऐसा तथ्य नहीं मिला जिसके आधार पर अपनी यात्रा की योजना बना सकूं और एक लेख मिला भी तो योजना बनाने के लिए नाकाफी था। फिर भी किसी तरह इस यात्रा की रूपरेखा तैयार हो गयी। बहुत सोच विचार के बाद कि किस दिन कहाँ तक जाना है और कहाँ रुकना है, और अगर पूर्वनियोजित योजना के अनुसार यात्रा में कुछ दिक्क्तें आती है तो उससे किस तरह निपटा और आगे की यात्रा को सकुशल पूरा किया जाये। मैं, मेरी पत्नी (कंचन), मेरा बेटा (अदित्यानन्द), मेरी माताजी और मेरे पिताजी कुल 5 लोगों के लिए मैंने यात्रा की योजना बनाई। बहुत सोचने के बाद मैंने 4 जून (शानिवार) 2016 को दिल्ली से प्रस्थान करने की योजना बनाई। सबसे पहले मैंने दिल्ली से हरिद्वार के लिए मसूरी एक्सप्रेस (ट्रेन संख्या 14041) का 5 टिकट बुक किया। मम्मी और पिताजी का 3 जून का टिकट पटना से दिल्ली के लिए बुक किया. जहाँ जहाँ भी हमलोगों को रुकना था वहाँ के लिए मैंने उत्तराखण्ड सरकार द्वारा संचालित गेस्ट हाउस गढ़वाल मंडल विकास निगम के गेस्ट हाउस (http://www.gmvnl.in) ही बुक किया था। ये एक ऐसी यात्रा है जहाँ आपको बहुत ही सचेत रहने की जरुरत है। इस यात्रा में आपको कुछ चीज़े अपने साथ जरूर रख लेनी होगी।