Sunday, February 25, 2018

उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-5 : कालभैरव मंदिर और सिद्धवट मंदिर (Kalbhairav Temple and Siddhvat Temple)

उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-5 : कालभैरव मंदिर और सिद्धवट मंदिर (Kalbhairav Temple and Siddhvat Temple)



उज्जैन के दर्शनीय स्थानों के भ्रमण की श्रृंखला में महाकालेश्वर मंदिर, विक्रमादित्य का टीला, हरसिद्धी मंदिर, भतृहरि गुफा और गढ़कालिका मंदिर जैसी जगहों को देखने के पश्चात आइए अब हम आपको कालभैरव मंदिर, सिद्धवट मंदिर, मंगलनाथ मंदिर और संदीपनी आश्रम लेकर चलते हैं। गढ़कालिका मंदिर में दर्शन के पश्चात आॅटो वाला हमें अगले पड़ाव की तरफ ले चला। हमारे ये पूछने पर कि अब यहां के बाद आप किस जगह पर ले चलेंगे तो उनका जवाब मिला कि अब हम पहले कालभैरव मंदिर जाएंगे उसके बाद सिद्धवट मंदिर। हम आॅटो वाले से बातें करते हुए चले जा रहे थे। करीब दस-पंद्रह मिनट के सफर के बाद दूर से ही एक मंदिर की तरफ इशारा करते हुए उन्होंने मुझे बताया कि वो मंदिर ही कालभैरव मंदिर है। साथ ही उन महाशय ने भी बताया कि यहां कालभैरव को प्रसाद के रूप में शराब चढ़ाया जाता है। मैंने उनसे कहा कि भाई मैं शराब नहीं पीता इसलिए मुझे शराब जैसी चीजों से कोई मतलब नहीं है। तब उन्होंने कहा कि आने वाला हर भक्त बाबा को शराब का भोग जरूर लगाता है इसलिए आप भी अपनी तरफ से बाबा को भोग लगा दीजिएगा। उनकी बातों पर मैंने कहा कि ठीक है भोग तो लगा देंगे पर हम उस भोग का करेंगे क्या क्योंकि मैं मदिरापान नहीं करता तो उन्होंने कहा कि कोई बात नहीं आप हमें दे दीजिएगा। ठीक है बोलकर मैं चुप रहना ही उचित समझा और चुप बैठ गया। ऐसे ही चलते हुए कुछ देर में हम मंदिर के पास पहुंच गए।

Wednesday, February 14, 2018

उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-4 : भतृहरि गुफा और गढ़कालिका मंदिर (Bharthari Gufa and Gadhkalika Temple)

उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-4 : भतृहरि गुफा और गढ़कालिका मंदिर (Bharthari Gufa and Gadhkalika Temple)



विक्रमादित्य का टीला देखने और हरसिद्धी मंदिर में दर्शन करने के बाद हम उज्जैन के कुछ प्रमुख दर्शनीय स्थानों (भतृहरि गुफा, गढ़कालिका मंदिर, कालभैरव मंदिर, सिद्धवट मंदिर, मंगलनाथ मंदिर और संदीपनी आश्रम) को देखने के लिए निकल पड़े। बड़ी मान-मनौती करने पर एक आॅटो वाला हमें इन जगहों पर घुमाने के लिए तैयार हो गया। मोल-तोल के बाद सौदा तय होने के बाद हम आॅटो में बैठ गए। मेरे आॅटो में बैठते ही उसने मेरे हाथ में एक कार्ड थमा दिया और खुद चाय पीने चला गया। मैंने कार्ड को उलट-पुट कर देखा तो एक तरफ किसी बड़े दुकान का विज्ञान छपा था और दूसरी तरफ उज्जैन के दर्शनीय स्थलों के नाम अंकित थे। कार्ड को देखने से ही पता चल रहा था कि दुकान वाले ने कार्ड छपवाकर आॅटो वालों को बांटा होगा कि इसी बहाने कुछ प्रचार-प्रसार हो जाएगा। पांच मिनट में ही आॅटो वाला भी अपनी चाय खत्म करके आ गया। उसके आते ही मैंने सबसे पहले उसे कहा कि भाई अब चलोगे या कुछ और बाकी है। जवाब मिला कि अब कुछ नहीं बस चलते हैं। इतना कहकर उसने आॅटो स्टार्ट किया और अपने मंजिल की तरफ बढ़ने लगा। अभी चले ही थे कि उसने अपने सवालों की बौछार आरंभ कर दिया कि कुछ खरीदना चाहते हैं, जैसे साड़ी, कपड़े, यहां की पुरानी चीजें आदि-आदि। मैंने उसे साफ मना कर दिया कि मैं कुछ खरीदने नहीं बस जगहों को देखने आया हूं। मेरी इन बातों को सुनते ही वो कुछ देर के लिए चुप हो गया।

Monday, February 12, 2018

पहाड़ : मेरा बालहठ

पहाड़ : मेरा बालहठ




हर इंसान की जिंदगी को कुछ न कुछ चीजें प्रभावित करती हैं। कुछ चीजों के प्रति उसका जुनून और पागलपन हमेशा उसके साथ रहता हैं। कुछ शब्द, कुछ वस्तुएं, शहर, गांव, नदियां, खेत, जानवर, पक्षी आदि बहुत सी चीजें हैं जिनसे इंसान प्रभावित होता है और किसी खास चीज से इंसान का खास लगाव भी रहता है। कुछ चीजें किसी खास इंसान को बहुत हद तक आकर्षित करती है। वैसे ही और लागों की तरह हमें भी बहुत सी देखी-अनदेखी चीजों ने आकर्षित किया है, जैसे पहाड़, समुद्र, नदी, झरने, सड़कें, बाढ़, हरे-भरे खेत आदि और भी न जाने कितनी चीजें हैं जिसके प्रति सदा ही मेरा आकर्षण रहा है। इन चीजों में पहाड़ और समुद्र दो ऐसे शब्द हैं जिसने मुझे बचपन से ही बहुत ज्यादा आकर्षित किया और इसका भी कुछ खास कारण रहा। वो कारण ये था कि और चीजें तो हम हर दिन देखते और महसूस करते थे पर पहाड़ और समुद्र से हम बहुत दूर थे। तो आइए आज हम आपको पहाड़ के बारे में अपने जुनून और पागलपन की बातें बताते हैं और समुद्र के बारे में फिर कभी। शुरुआत एक फिल्मी गाने से करता हूं, जो पता नहीं किस फिल्म का है जो मुझे पता नहीं क्योंकि मैं फिल्में नहीं देखता हूं और न ही गाने सुनता हूं। वैसे गाने की पंक्तियां तो न चाहते हुए भी सुननी पड़ती है क्योंकि बसों, दुकानों, चौक-चौराहे पर आते-आते गाने सुनने को मिल जाते हैं जिसे न चाहकर भी सुनना पड़ता है, उसमें ही कुछ पंक्तियां याद भी रह जाती है, तो दो पंक्तियां आपके सामने प्रस्तुत करता हूं :

Sunday, February 11, 2018

उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-3 : विक्रमादित्य का टीला और हरसिद्धी मंदिर (Vikrmaditya ka Teela and Harsiddhi Temple)

उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-3 : विक्रमादित्य का टीला और हरसिद्धी मंदिर (Vikrmaditya ka Teela and Harsiddhi Temple)



महाकालेश्वर मंदिर में भोलेनाथ के दर्शन के बाद आइए अब चलते हैं उज्जैन के अन्य दर्शनीय स्थानों का भ्रमण करते हैं। मंदिर में दर्शन, पूजा-पाठ आदि कार्यकलापों को पूरा करते-करते तीन बज चुके थे। स्थानीय लोगों से पूछने पर पता चला कि अन्य स्थानों पर जाने के लिए आॅटो हरसिद्धी मंदिर के पास बहुत ही आसानी से मिल जाएगी। रामघाट से यहां आते समय हमें हरसिद्धी मंदिर के दर्शन हुए थे इसलिए वहां तक के लिए किसी से रास्ते के बारे में पूछने की कोई आवश्यकता नहीं थी। अपनी आदत के अनुसार रास्ते में दाएं-बाएं निहारते हुए अपनी ही मस्ती में अकेला चला जा रहा था। अभी कुछ ही दूर गया था कि बाएं तरफ एक बड़ा सा दरवाजा दिखा। पहले तो मन में आया कि ऐसे ही कुछ होगा, पर नहीं पास जाने पर बोर्ड पर विक्रमादित्य का टीला लिखा हुआ दिख गया। विक्रमादित्य का नाम आते ही बचपन में विक्रम-वैताल की कहानियां याद आ गई और अब तक की पढ़ी गई सारी कहानियां दिमाग में ऐसे घूमने लगी जैसे अभी मेरे सामने से राजा विक्रमादित्य गुजर रहे हैं और उनके कंधे पर वो वैताल बैठ कर कहानी सुनाता हुआ जा रहा है। बचपन में जब उन कहानियों को पढ़ा करता था तो ये सोचा भी नहीं था कि हम कभी विक्रमादित्य की उस नगरी में जाएंगे जहां से ये कहानियां आरंभ हुई है।

Thursday, January 25, 2018

उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-2 : महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग (Ujjain-Omkareshwar Journey-2: Mahakaleshwar Jyotirling)

उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-2 : महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग (Ujjain-Omkareshwar Journey-2: Mahakaleshwar Jyotirling)



उज्जैन पहुंचते पहुंचते बारह बज चुके थे। गाड़ी के स्टेशन पहुंचते ही ट्रेन से उतर कर जल्दी से स्टेशन से बाहर गए। सड़क पर पहुंचते ही एक आॅटो मिल गई जो दस रुपए प्रति सवारी के हिसाब से लोगों को रामघाट तक ले जा रही थी। हम आॅटो में बैठे ही थे कि उसके तुरंत बाद मेरी ही उम्र का एक व्यक्ति और आया जो मेरे ही बगल में बैठ गया। जल्दी ही बातें होने लगी तो पता चला कि वो भी उज्जैन और ओंकारेश्वर घूमने के लिए आए हैं। हम दोनों ही इस शहर से अनजान थे, अतः एक दूसरे का साथ पाकर थोड़ी सी ये तो उम्मीद बंधी कि चलिए ज्यादा तो नहीं कम से कम रामघाट पर नहाने भर का साथ तो रहेगा ही। कुछ देर में ही आॅटो भी सवारियों से भर गई। आॅटो वाले ने आॅटो को स्टार्ट किया और रामघाट की तरफ चल दिया। अभी आधे ही दूर गए थे कि सभी सवारियां उतर गई। अब आॅटो में केवल हम दो लोग ही बैठे रह गए थे। सभी सवारियों के उतरने के बाद आॅटो वाला पहले तो हमें आधे रास्ते में उतारने की कोशिश करने लगा, पर हमने साफ कहा कि भाई रामघाट बोलकर आॅटो में बैठाए हो और हम रामघाट पर ही उतरेंगे अगर रामघाट नहीं पहुंचा सकते तो मुझे वापस स्टेशन ही पहुंचा दो और उस बाद के कोई पैसे नहीं मिलेंगे, तो न चाहते हुए भी आॅटो वाले ने आधे मन से हमें रामघाट तक पहुंचाया।

Tuesday, January 23, 2018

उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-1 : दिल्ली से उज्जैन (Ujjain-Omkareshwar Journey-1: Delhi to Ujjain)

उज्जैन-ओंकारेश्वर यात्रा-1 : दिल्ली से उज्जैन (Ujjain-Omkareshwar Journey-1: Delhi to Ujjain)




रामेश्वरम के पवित्र ज्योतिर्लिंग के दर्शन करके लौटने के बाद से ही उज्जैन में स्थित महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने का मन होने लगा था। जैसा कि हमारी एक गलत आदत है कि कहीं भी जाओ तो एक जगह जाकर वापस आना मुझे अच्छा नहीं लगता है तो हमने उज्जैन के पास ही स्थित किसी और जगह जाने के बारे में हिसाब-किताब लगा लिया और वो जगह थी ओम्कारेश्वर। उज्जैन और ओंकारेश्वर में कोई खास दूरी नहीं है और उज्जैन से करीब चार घंटे का सफर करके ओंकारेश्वर पहुंचा जा सकता है तो हमने उसी हिसाब से उज्जैन के साथ-साथ ओंकारेश्वर को भी अपनी इस यात्रा में जोड़ लिया। छुट्टियों के हिसाब से बहुत सोच विचार कर दिन और तिथियों का हिसाब लगाया तो अगस्त में दो ऐसा संयोग बन रहा था कि एक छुट्टी लेकर इस यात्रा को अंजाम दिया जा सकता था। पहला संयोग था 6 से 8 अगस्त और दूसरा था 13 से 15 अगस्त। 6 से 8 अगस्त तो पहले ही तुंगनाथ-चंद्रशिला के लिए आरक्षित हो चुका था तो दूसरे विकल्प पर ही जाने का निश्चित हुआ। अतः 13 अगस्त रविवार और 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस की छुट्टी को देखते हुए हमने आॅफिस में पहले ही बीच में पड़ रहे 14 अगस्त की छुट्टी के लिए आवेदन दे दिया। अब एक दिन की छुट्टी ले रहा था तो कोई दिक्कत नहीं हुई।

Wednesday, November 8, 2017

तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा (भाग 9) : चोपता से दिल्ली

तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा (भाग 9) : चोपता से दिल्ली 




जब हम किसी यात्रा पर अपने घर से निकलते हैं तो उसका रोमांच अलग होता है लेकिन यात्रा पूरी करके वापस लौटने पर वो रोमांच नहीं रह जाता तो जाते समय होता है। पर हमारी इस यात्रा में घर से निकलकर यात्रा पूरी करके वापस आने तक पूरी तरह रोमांच बना रहा। चार दिन की इस यात्रा में हमने दिल्ली से हरिद्वार तक की यात्रा ट्रेन से तय किया। ट्रेन से सफर करते हुए हमें हरिद्वार में उतरना था पर नींद नहीं खुली और हम देहरादून के करीब पहुंच गए और ऐसे ही बीच रास्ते में ट्रेन रुकने पर वहीं उतर कर पैदल ही निकल पड़े। हरिद्वार पहुंचने के बाद हम उखीमठ के लिए निकले पर परिस्थितियों ने हमें उखीमठ के बदले गुप्तकाशी पहुंचने पर मजबूर कर दिया। गुप्तकाशी में बाबा विश्वनाथ के दर्शन के पश्चात हम उखीमठ में स्थित प्रसिद्ध कालीपीठ पहुंचे और फिर उसके बाद चोपता गए। चोपता से भारी बरसात में चढ़ाई करके तुंगनाथ पहुंचे और यहां भी परिस्थितियों ने कुछ और ही बाधा में डाला। उसके बाद पहले तुंगनाथ से चंद्रशिला की तरफ निकले जहां रास्ता भटककर हम कहीं और पहुंचे और सकुशल वापस भी आए। अगले दिन एक बार फिर तुंगनाथ से चंद्रशिला देखने चले और इस बार सकुशल पहुंचकर एक अद्वितीय अनुभव लेने के बाद वापस तुंगनाथ मंदिर आकर भगवान भोलेनाथ के दर्शन और जलाभिषेक के पश्चात वापस चोपता आ गए। वापसी का हमारा सफर तो तुंगनाथ मंदिर में भोलेनाथ के दर्शन के पश्चात ही शुरू हो गया था। बरसात में ही हम तुंगनाथ से चोपता आए। तुंगनाथ से चोपता आकर कुछ देर के विश्राम के पश्चात हमारा कारवां हरिद्वार की तरफ चलने को तैयार था।

Tuesday, November 7, 2017

तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा (भाग 8) : चंद्रशिला फतह और चोपता वापसी

तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा (भाग 8) : चंद्रशिला फतह और चोपता वापसी




तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा के इस भाग में आइए हम आपको तुंगनाथ मंदिर से चद्रशिला की चोटी तक ले चलते हैं। जैसा कि पहले के आलेखों में आपने पढ़ा कि कैसे हम तुंगनाथ मंदिर पहुंचे फिर चंद्रशिला गए। जब चंद्रशिला जा रहे थे तो चंद्रशिला के रास्ते से भटककर गोपेश्वर के रास्ते पर चले गए और बहुत मुश्किल हालातों में उलझकर किसी तरह वापस आए। रास्ते में आने वाली दुश्वारियों ने हमारे चंद्रशिला तक पहुंचने के हौसले को तोड़ दिया था, पर उसी शाम तुंगनाथ मंदिर परिसर से प्रकृति के कुछ अद्भुत दृश्यों के दर्शन हुए और उन अद्भुत दृश्यों को देखकर एक उम्मीद जगी और फिर से चंदशिला जाने की योजना बनाई। चंद्रशिला समुद्र तल से लगभग 4000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और तुंगनाथ जी का मंदिर लगभग 3600 मीटर की ऊंचाई पर है। दोनों स्थानों के बीच की दूरी करीब 1.5 किलोमीटर है। 1.5 किलोमीटर की दूरी में करीब 400 मीटर की ऊंचाई चढ़ने का मतलब ही है कि अपने आप में एक कठिन परीक्षा से होकर गुजरना। तुंगनाथ मंदिर के दर्शन करने के लिए आने वाले अधिकतर लोग मौसम की बेरुखी से परेशान होकर चंद्रशिला न जाकर मंदिर से ही वापस चले जाते हैं। यहां का मौसम हर पल बदलता है। इस बात का कोई पता नहीं कि कब यहां बरसात हो जाए और कब मौसम अच्छा हो जाए। जो लोग चंद्रशिला पहुंच भी जाते हैं तो इस बात की कोई उम्मीद नहीं होती कि वहां सब कुछ अच्छा ही दिखेगा। कभी कभी तो चंद्रशिला के पास जाने पर भी चंद्रशिला साफ नहीं दिख पाता। यदि किस्मत अच्छी हो और मौसम साफ हो तो चंद्रशिला से हिमालय का जो नजारा दिखता है कि उसके आगे सब कुछ छोटा लगने लगता है। मैं भी चंद्रशिला तो पहुंच गया पर मौसम की बेरुखी ने हमें उन अद्भुत दृश्यों को देखने से वंचित ही रखा, पर वहां तक पहुंच जाने की जो खुशी महसूस हुई वो भी कम नहीं थी।

Saturday, November 4, 2017

तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा (भाग 7) : चंद्रशिला का अधूरा सफर

तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा (भाग 7) : चंद्रशिला का अधूरा सफर




तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा के इस भाग में आइए हम आपको एक ऐसे सफर पर ले चलते हैं जिसमें न तो कोई मंजिल न ही कोई पड़ाव है, अगर कुछ है तो वो है अनजान, खतरनाक और डरावने रास्ते। जहां कोई अपनी मर्जी से जाना नहीं चाहता, बस कोई भटकाव ही किसी इंसान को उस रास्ते पर ले जा सकता है और ऐसा ही कुछ हम लोगों के साथ हुआ। अब तक आपने देखा कि मौसम कि इतनी दुश्वारियां और परेशानियां झेलते हुए हम तुंगनाथ मंदिर तक पहुंचे। मंदिर के पास पहुंचते ही पता चला कि आज ग्रहण है इसलिए अब मंदिर बंद हो चुका है जो कल सुबह 5ः30 बजे खुलेगा। हम लोगों के लिए यह भी एक मुसीबत के जैसा ही था कि तीन दिन का सफर करके हम लोग यहां तक आए और जिस चीज के लिए आए वही चीज न मिल पाया। थक-हार हमने यहीं रुकने का प्लान बनाया। अब यहां बैठ कर समय बर्बाद करने से अच्छा हमने चंद्रशिला जाने की योजना बनाई। चंद्रशिला समुद्र तल से लगभग 4000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। तुंगनाथ जी का मंदिर लगभग 3600 मीटर की ऊंचाई पर है और चंद्रशिला करीब 4000 मीटर की ऊंचाई पर है और दोनों स्थानों के बीच की दूरी करीब 1.5 किलोमीटर है। अब इन आंकड़ों पर गौर करें तो चढ़ाई बहुत मुश्किल है। वैसे भी तुंगनाथ से चंद्रशिला जाने का कोई रास्ता नहीं बना है, बस कुछ जुनूनी लोगों के आने-जाने से कुछ निशान बन गए हैं और वही रास्ता है। बरसात के कारण वो रास्ते भी न जाने कितने फिसलन भरे हुए हो गए होंगे इसका पता तो वहां जाकर ही लगेगा। जाने से पहले भी बहुत सोच विचार करना पड़ रहा था कि अगर किसी कारण से फिसलन भरे रास्तों पर गिर गए और भीग गए तो हमारे पास पहनने के लिए अलग से कोई कपड़े नहीं हैं क्योंकि हमारा सारा सामान नीचे चोपता में ही था। हम लोगों ने जो कपड़े पहन रखा था उसके अलावा हम लोगों के पास तौलिया के अलावा और कुछ नहीं था, फिर भी हम सबने एक मत से चंद्रशिला जाने के लिए तैयार हो गए। अचानक ही धीरज और सुप्रिया जी ने जाने से मना कर दिया तो हम मैं, बीरेंद्र भाई जी, सीमा जी और राकेश जी ही चंद्रशिला की तरफ रवाना हुए।

Friday, November 3, 2017

तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा (भाग 6) : तुंगनाथ जी मंदिर

तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा (भाग 6) : तुंगनाथ जी मंदिर





तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा के इस भाग में हम आपको तुंगनाथ मंदिर ले चलते हैं। तुंगनाथ का स्थान पंच केदारों में से तीसरे स्थान पर है। पहले स्थान पर केदारनाथ मंदिर जो द्वादश ज्योतिर्लिगों मे से एक है। द्वितीय केदार के रूप में भगवान मदमहेश्वर की पूजा की जाती है। तुंगनाथ मंदिर तृतीय केदार के नाम से जाना जाता है। चतुर्थ और पंचम केदार क्रमशः रुद्रनाथ और कल्पेवश्वर को माना जाता है। तुंगनाथ जी का मंदिर समुद्र तल से लगभग 3680 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। मंदिर कई पौराणिक तथ्यों को अपने आप में समेटे हुए है। कथाओं के आधार पर यह माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण पांडवों ने किया था। मंदिर का इतिहास हजारों साल पूर्व का रहा है। यहीं मंदिर से कुछ ऊपर एक चंद्रशिला नामक चोटी है जिसके बारे में कहा जाता है कि राम ने रावण का वध करने के पश्चात ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त होने के लिए कुछ दिन तक इस चोटी पर तपस्या की थी और तभी से इस स्थान का नाम चंद्रशिला पड़ गया। यह मंदिर केदारनाथ और बदरीनाथ मंदिर के लगभग बीच में स्थित है। यह गढ़वाल के सुंदर स्थानों में से एक है। जनवरी से मार्च तक मंदिर पूरी तरह से बर्फ में डूबा हुआ होता है। बरसात के मौसम में दूर दूर तक हरियाली ही हरियाली दिखती है। तुंगनाथ तक पहुंचने के लिए चोपता से तुंगनाथ तक की तीन किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई का रास्ता पैदल ही तय करना पड़ता है। चोपता से तुंगनाथ के पैदल मार्ग को हर जगह 3 किलोमीटर ही लिखा गया है पर मुझे ये दूरी 3 किलोमीटर से ज्यादा प्रतीत होती है। अब चाहे दूरी जितनी हो जिनको जाना है वो चाहे कितनी भी दूरी वो तो जाएंगे ही।

Thursday, November 2, 2017

तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा (भाग 5) : गुप्तकाशी से चोपता

तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा (भाग 5) : गुप्तकाशी से चोपता




तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा के इस भाग में आईए हम आपको ले अपने साथ चोपता तक लेकर चलेंगे। चोपता का नाम सुनते ही कुछ अजीब सा लगता है कि कैसा नाम है चोपता। चोपता नाम बेशक कुछ बेढब सा है, मगर यह उत्तराखंड में गढ़वाल हिमालय की सबसे खूबसूरत जगह है। यहां पहुंचकर आप प्रकृति से सीधा साक्षात्कार कर सकते हैं। चोपता समुद्र तल से करीब 12 हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित है और इससे थोड़ी ज्यादा ऊंचाई तक का क्षेत्र हम सबकी पहुंच में होता है। यहां आपने के लिए सबसे उपयुक्त समय मई से लेकर नवंबर तक है लेकिन बरसात में यहां आना थोड़ी परेशानी खड़ी करता है। दिसंसबर से अप्रैल तक यहां की ठंड बिल्कुल ही असहनीय होती है। यहां बहने वाली हवाएं बहुत ही ठंडी होती है। यहां आस-पास चारों तरफ फैली हरियाली के बीच पल-पल बारिश से सामना और बदन पर बादलों की मखमली छुअन का आनंद ही कुछ और है। तुंगनाथ जाने के लिए चोपता आधार शिविर हैं। चोपता तक आप सड़क मार्ग से आ सकते हैं और चोपता से आगे का सफर पैदल चढ़ाई या घोड़े से पूरी होती है। भले ही ही यहां खाना-पीना थोड़ा महंगा मिलता है पर खाने-पीने की कोई दिक्कत नहीं है। यहां दूर दूर तक फैले घास के मैदान जिसे स्थानीय भाषा में बुग्याल कहते है, आपको एक अलग ही दुनिया की सैर कराती नजर आएंगी। वैसे अगर हम अपने अनुसार कहें तो चोपता के तारीफ जितनी की जाये उतनी कम है। कुछ लोगा तो चोपता की तुलना स्वीटजरलैंड से करते हैं। प्रकृति की ने भी इस जगह को दिल खोलकर सजाया-संवारा है। आज भी यह स्थान शहरों की भागा-दौड़ी से बहुम दूर है। भीड़भाड़ के नाम पर यहां केवल कुछ ढाबे और कुछ दो कमरे वाले होटल हैं, जिसमें यहां आने वाले यात्री विश्राम कर सकते हैं और साथ ही जो भी गेस्टहाउस या ढाबे यहां पर बने हैं सब लकड़ी के ही बने मिलते हैं।

Wednesday, November 1, 2017

तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा (भाग 4) : कालीपीठ, उखीमठ

तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा (भाग 4) : कालीपीठ, उखीमठ



तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा के इस भाग में आईए हम आपको ले चलते हैं उस स्थान पर जिसका संबंध शिव और शक्ति दोनों से है और उस पवित्र स्थान का नाम है कालीमठ। कालीमठ रुद्रप्रयाग (उत्तराखंड) जिले का एक प्रमुख धार्मिक स्थल है। यह गुप्तकाशी और उखीमठ के बीच सरस्वती नदी के किनारे पर स्थित है। इसे भारत के सिद्ध पीठों में एक माना जाता है। कालीमठ में देवी काली का एक बहुत ही प्राचीन मंदिर है। कहा जाता है कि मां भगवती ने इस स्थान पर दैत्यों के संहार के लिए काली का रूप धारण किया था और उसी समय से इस स्थान पर भगवती के काली रूप की पूजा-अर्चना होती आ रही है। यहां देवी काली ने दुर्दान्त दैत्य रक्तबीज का संहार किया था, उसके बाद देवी इसी जगह पर अंतर्धान हो गई। कहा यह भी जाता है कि यही जगह प्रसिद्ध कवि कालीदास का साधना-स्थली भी थी। इसी जगह पर कालीदास ने मां काली को प्रसन्न करके विद्वता प्रदान की थी। यह स्थान धार्मिक दृष्टिकोण से तो महत्वपूर्ण है साथ यहां प्रकृति का भी अलौकिक सौंदर्य बिखरा पड़ा है। साल 2013 में आई केदारनाथ त्रासदी के दौरान कालीमठ में स्थित मां लक्ष्मी, शिव मंदिर, ब्रती बाबा समाधि स्थल, मंदिर समिति कार्यालय समेत स्थानीय लोगों के कई व्यापारिक प्रतिष्ठान आपदा की भेंट चढ़ गये थे। महालक्ष्मी मंदिर के टूटने के साथ ही मंदिर में रखी हुई पौराणिक पत्थर तथा धातु की मूर्तियों में से कई मूर्तियां सरस्वती नदी के उफान में बह गई। सरस्वती नदी के दीवार के साथ बनी रेलिंग पर भक्तों द्वारा बांधी गई घंटियां इसकी शोभा में चार चांद लगाने का काम करती है।

Monday, October 30, 2017

तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा (भाग 3) : काशी विश्वनाथ मंदिर, गुप्तकाशी

तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा (भाग 3) : काशी विश्वनाथ मंदिर, गुप्तकाशी



तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा के इस भाग में आईए हम आपको ले चलते हैं गुप्तकाशी में स्थित भगवान भोलेनाथ के प्रसिद्ध और पुरातन मंदिर में जिसका संबंध महाभारत काल से ही है। गुप्तकाशी कस्बा केदारनाथ यात्रा का मुख्य पड़ाव है। कहा जाता है कि पहले इसका नाम मण्डी था। जब पांडव भगवान् शंकर के दर्शन हेतु जा रहे थे तब इस स्थान पर शंकर भगवान् ने गुप्तवास किया था जिसके बाद पांडवों ने यहां काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण किया था। इस कारण इस स्थान का नाम गुप्तकाशी पड़ा। काशी विश्वनाथ के मंदिर में एक मणिकर्णिका नामक कुंड है जिसमे गंगा और यमुना नामक दो जलधाराएं बहती है। हमने भी अपनी तुंगनाथ यात्रा के दौरान इस मंदिर में महादेव के दर्शन किया तो आइए आप भी हमारे साथ इस मंदिर में भगवान भोलेनाथ के दर्शन करिए। कहा जाता है न कि जो होता है अच्छे के लिए होता है। अगर कल शाम को बरसात न हुई होती तो शायद हम गुप्तकाशी न आकर उखीमठ ही चले जाते और उखीमठ जाते तो ये यात्रा केवल तुंगनाथ तक ही सीमित रह जाती और हम गुप्तकाशी में स्थित भगवान भोलेनाथ के दर्शन के से वंचित रह जाते वो भी श्रावण महीने के पूर्णिमा के दिन। मेरे सबसे पहले जागने और नहा-धो कर तैयार होने का मुझे एक फायदा यह मिला कि जब तक हमारे सभी साथी स्नान-ध्यान में लगे तब तक हम पहाड़ों की खूबसरती का दीदार करने के लिए गेस्ट हाउस की छत पर चला गया। यहां जाकर जो पहाड़ों में बरसात का जो नजारा दिखा वो कभी न भूलने वाले पलों में शामिल हो गया। बहुत लोगों को कहते सुना है कि बरसात में पहाड़ों की घुमक्कड़ी करने से बचना चाहिए और ये बात बहुत हद तक सही भी है। पर इस बरसात में यहां आकर हमने पहाड़ों का जो सौंदर्य देखा उसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता। जिस तरह शादी में नई दुल्हन सजी संवरी होती है ठीक वैसे ही पहाड़ भी इस मौसम में एक दुल्हन की तरह दिख रही थी। बरसात के कारण मुरझाए पेड़ों पर हरियाली छाई हुई थी। पिछले साल जब जून के महीने में हम यहां आए तो यही पहाड़ सूना-सूना लग रहा था पर बरसात में इन पहाड़ों का मुझे एक अलग ही रूप देखने को मिला। एक तो हरा-भरा पहाड़ उसके ऊपर से अठखेलियां करते बादल का आना और जाना मन को मुग्ध कर रहा था।

Friday, October 27, 2017

तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा (भाग-2) : हरिद्वार से गुप्तकाशी

तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा (भाग-2) : हरिद्वार से गुप्तकाशी



तुंगनाथ चंद्रशिला यात्रा के दूसरे भाग में आइए आपको ले चलते हैं हरिद्वार से गुप्तकाशी। हरिद्वार में सब कुछ करते करते नौ बज चुके थे। करीब साढ़े नौ बजे हम धर्मशाला से निकलकर बस स्टेशन की तरफ चल पड़े। बस स्टेशन धर्मशाला से केवल 5 मिनट की दूरी पर था तो हम सब जल्दी ही वहां पहुंच गए। बस स्टेशन के पास बाहर ही कुछ प्राइवेट बसें खड़ी थी जिसमें से एक बस गोपेश्वर जा रही थी। बस बिल्कुल ही खाली थी। हम सभी लोग उसी बस में बैठ गए कि रुद्रप्रयाग में उतर फिर वहां से उखीमठ की बस में बैठ जाएंगे, पर होनी को तो कुछ और मंजूर था। बस में बैठने के बाद बीरेंद्र भाई ने कहा कि इस बस के पीछे एक बस है जो सीधे उखीमठ जा रही है। हमने थोड़ा तांक-झांक कर देखा तो ये मालूम पड़ गया कि उस बस में हम सभी के लिए अच्छी सीट मिलने वाली नहीं है इसलिए हमने इसी बस से रुद्रप्रयाग तक जाना उचित समझा और रुद्रप्रयाग पहुंचकर वहां से किसी दूसरे बस या मैक्स वाहन से उखीमठ तक का सफर तय कर लेंगे। बस ठीक साढ़े दस बजे हरिद्वार से चल पड़ी और कुछ ही देर में भीड़ भरे बाजार से होते हुए हरिद्वार-ऋषिकेश बाईपास पर आ गई। मौसम में गर्मी के साथ उमस भरी हुई थी पर बस के चलने से बस के अंदर हवा का संचार हुआ तो गर्मी और उमस से थोड़ी राहत मिलनी आरंभ हो गई। कुछ ही देर में बस चिल्ला वन्यजीव अभ्यारण रेंज में प्रवेश कर गई। चिल्ला वन्यजीव अभ्यारण्य वर्ष 1977 में बनाया गया था। यह 249 वर्ग किमी के क्षेत्र में फैला हुआ है। यह हरिद्वार से 10 किमी दूर गंगा नदी के किनारे स्थित है। वर्ष 1983 में इसे मोतीचूर एवं राजाजी अभ्यारण्यों के साथ मिलाकर राजाजी राष्ट्रीय उद्यान बनाया गया। चिल्ला वन्यजीव अभ्यारण्य में कई प्राणी है जैसे कि चीते, हाथी, भालू और छोटी बिल्लियाँ आदि। यहां से गुजरने पर कई तरह के सुंदर पक्षियों, तितलियों को देखने का सौभाग्य प्राप्त होता है। वैसे इस अभ्यारण्य में भ्रमण करने के लिए नवंबर से जून के बीच का समय सबसे अच्छा माना जाता है। हरिद्वार से ऋषिकेश और ऋषिकेश से हरिद्वार आने जाने वाली अधिकतर गाडि़यों दिन के समय इसी रास्ते से आती जाती है, पर रात में यहां से किसी भी प्रकार की गाडि़यों का गुजरना प्रतिबंधित है।

Friday, October 13, 2017

तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा (भाग 1) : दिल्ली से हरिद्वार

तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा (भाग 1) : दिल्ली से हरिद्वार





आइए अपनी इस यात्रा में हम आपको उस स्थान पर ले चलते हैं, जो भगवान शिव से संबंधित है और उस जगह का नाम है तुंगनाथ। तुंगनाथ को पांच केदारों में से एक हैं। कुछ समय पहले जब हमने केदारनाथ की यात्रा किया था तो ये सोचा भी नहीं था कि कुछ ही समय बाद मुझे एक और केदार के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त होगा। कहा जाता है कि जब तक महादेव का बुलावा न आए तब तक यहां कोई नहीं आ सकता और जब बुलावा आ जाए तो इंसान खुद न चाहते हुए भी वहां पहुंच जाता है। मेरे साथ भी कुछ वैसा ही हुआ। मई महीने की बात है मेरे एक घुमक्कड़ मित्र संजय कौशिक हैं, जिन्होंने मुझे तुंगनाथ चलने के लिए कहा, पर व्यस्तता के कारण मैं उनके साथ नहीं जा सका। पर उसी दिन मैंने ये निर्णय ले लिया कि जितना जल्दी हो मैं तुंगनाथ जी के दर्शन कर लूंगा और उसी दिन छुट्टियों का हिसाब देखकर 6 से 8 अगस्त तक तुंगनाथ जाने की योजना बना लिया। 6 अगस्त रविवार, 7 अगस्त को रक्षाबंधन की छुट्टी और 8 अगस्त को आॅफिस से छुट्टी लेकर तुंगनाथ जाने की योजना पर काम करने लगा। 5 अगस्त रात्रि में दिल्ली से प्रस्थान और वापसी में 8 अगस्त की रात्रि में हरिद्वार से वापसी का निश्चित किया। अब बात रह गई हरिद्वार तक आने जाने की टिकट के लिए। साथ चलने के लिए किसी साथी की तलाश में करीब महीना भर बीत गया पर कोई भी साथ जाने के लिए नहीं मिला। अंत में थक हार कर हमने टिकट बुकिंग की प्रक्रिया शुरू की। ट्रेन के समयानुसार अगर हम मूसरी एक्सप्रेस का टिकट लेते तो हरिद्वार सुबह के सात बजे पहुंचते लेकिन हम वहां जल्दी पहुंचना चाहते थे जिससे हरिद्वार में हमें थोड़ा ज्यादा समय मिल सके। यही सब सोचकर हमने नंदा देवी एक्सप्रेस में टिकट देखा तो दिल्ली से हरिद्वार के लिए कोई टिकट उपलब्ध नहीं थी पर दिल्ली से देहरादून के लिए कुछ सीटें उपलब्ध थी, तो हमने दिल्ली से देहरादून की ही टिकट ले लिया पर उतरना मुझे हरिद्वार में ही था। नंदा देवी एक्सप्रेस का टिकट हमने हरिद्वार में कुछ ज्यादा समय मिलने के लिए लिया था पर दुर्भाग्यवश या कहिए कि मेरी लापरवाही से मुझे ज्यादा किया थोड़ा समय भी नहीं मिल सका और इसके बारे में आप आगे पढ़ेंगे। वापसी की टिकट भी इसी हिसाब से लेना था कि आने के बाद उसी दिन आॅफिस ज्वायन कर लें और उसके लिए मसूरी एक्सप्रेस एक्सप्रेस से आकर आॅफिस नहीं पकड़ सकता था क्योंकि मसूरी एक्सप्रेस दिल्ली आठ बजे सुबह पहुंचाती है। अतः हमने वापसी का टिकट भी नंदा देवी से ही लिया क्योंकि नंदा देवी दिल्ली सुबह 5 बजे ही पहुंच जाती है। नंदा देवी हरिद्वार से रात में 12:50 पर चलती है, इसलिए तकनीकी रूप से मैंने 9 अगस्त का टिकट लिया। वैसे कहा 8 अगस्त ही जाता पर रात के बारह बजे के बाद की ट्रेन के कारण 9 अगस्त की टिकट हुई। टिकट कर लेने के बाद हम यात्रा की तिथि का इंतजार करने लगे।

Friday, October 6, 2017

त्रिवेंद्रम से दिल्ली : एक रोमांचक रेल यात्रा

त्रिवेंद्रम से दिल्ली : एक रोमांचक रेल यात्रा



14 जून 2017 : आठ दिन से घूमते हुए अब यात्रा बिल्कुल अंतिम दौर में पहुंच चुकी थी। पद्मनाभ स्वामी मंदिर और कोवलम बीच से आने के बाद अब हमें वापसी की राह पकड़नी थी। तिरुवनंतपुरम् सेंट्रल स्टेशन से हमारी ट्रेन (ट्रेन संख्या 22633) दोपहर 2:15 पर थी। वैसे तो आम दिनों में इस ट्रेन को त्रिवेंद्रम से दिल्ली पहुंचने में 48 घंटे का समय लगता है पर माॅनसून के समय यही ट्रेन दिल्ली पहुंचाने में 52 का घंटे का समय लेती है। एक बजे तक हम लोगों ने सारा सामान पैक किया और खाने के लिए निकल पड़े और स्टेशन परिसर में ही बने फूड प्लाजा में खाना खाया और फिर वापस आकर सामान उठाकर प्लेटफार्म की तरफ चल पड़े। हमें प्लेटफाॅर्म पर पहुंचते पहुंचते 1:45 बज चुके थे। प्लेटफाॅर्म पर गया तो तो देखा कि ट्रेन पहले से ही खड़ी है और अधिकतर यात्री अपनी अपनी सीटों पर बैठ चुके हैं। जब हम अपनी सीट पर गए तो देखा कि कुछ लोग हमारी सीट पर भी कब्जा जमाए हुए हैं। अपनी सीट प्राप्त करने के लिए पहले तो उन लोगों से बहुत देर तक मुंह ठिठोली करनी पड़ी। इस सीट पर से हटाएं तो उस सीट पर बैठ जाएं, वहां से हटाएं तो फिर दूसरी पर। थक हार कर मुझे ये कहना पड़ा कि इस कूपे की सारी सीटें मेरी है। 4 लोगों में से 3 लोग तो आराम से निकल लिए पर चाौथे ने जिद पकड़ रखी थी नहीं जाने की और हमारी भी जिद थी हटाने की, लेकिन फिर हमने सोचा कि चलिए कुछ देर बैठने ही देते हैं फिर देखा जाएगा। इसी दौरान उन महाशय ने ये कह दिया कि क्या आपने ट्रेन खरीद लिया है और इसी बात की जिद से हमने भी उनको सीट से हटा कर ही दम लिया। अपनी ही जगह के लिए इतनी मशक्कत इस यात्रा में पहली ही बार हुआ। खैर मुझे सीट मिल गई और वो भाई साहब कहीं और जाकर बैठ गए।

Friday, September 22, 2017

त्रिवेंद्रम यात्रा : पद्मनाभस्वामी मंदिर और कोवलम बीच

त्रिवेंद्रम यात्रा : पद्मनाभस्वामी मंदिर और कोवलम बीच


आज हमारी यात्रा का आठवां दिन था और हमारी यात्रा अब धीरे धीरे अंतिम अवस्था में पहुंच रही थी। त्रिवेंद्रम से दिल्ली की हमारी ट्रेन दोपहर बाद 2ः15 बजे थी। तब तक पहले की बनी योजना के अनुसार आज पद्मनाभ स्वामी मंदिर में भगवान विष्णु के दर्शन करना और उसके बाद कोवलम बीच जाना था। उसके बाद वापसी में समय बचने पर गणपति मंदिर में गणपति जी के दर्शन करना था। तड़के सुबह 3 बजे अलार्म बजने के साथ ही नींद खुल गई। रात में 11 बजे के बाद तो सोए थे और 4 घंटे में नींद ठीक से पूरी हुई भी नहीं कि जागना पड़ रहा था। वैसे भी घुम्मकड़ी में नींद और भूख दोनों को त्यागना पड़ता है तभी घुमक्कड़ी हो सकती है। खैर जैसे तैसे आंखे मलते हुए उठे और दूसरे कमरे में सो रहे सभी लोगों को जगाया। यहां कमरा भी ऐसा मिला था कि हरेक व्यक्ति के लिए एक छोटा कमरा था और हम पांच लोगों के लिए पांच अलग अलग कमरे थे। हमारी योजना मंदिर 5 बजे से पहले पहुंचने की थी इसलिए सब जल्दी जल्दी नहा धो कर निकलने की तैयारी करने लगे। 4 बजते बजते हम लोग तैयार हो गए। सारा सामान पैक कर लिया गया कि आने के बाद ज्यादा समय न लगे और गीले कपड़े सूखने के लिए कमरे में ही डाल दिया गया। इतना सब करते करते 4ः15 बज गए। मंदिर जाने के लिए हम कमरे से निकले तो अभी बाहर बिल्कुल घना अंधेरा था। स्टेशन से बाहर आते ही हमें पद्मनाभ स्वामी मंदिर जाने के लिए केवल 50 रुपए में एक आॅटो मिल गया। आॅटो वाले से हमने मंदिर के मुख्य दरवाजे की तरफ छोड़ने का कहा। केवल 10 मिनट के सफर में हम मंदिर के पास पहुंच गए और आॅटो वाले को पैसे देकर हम मंदिर की तरफ बढ़ गए।

Friday, September 15, 2017

कन्याकुमारी यात्रा (भाग 2) : भगवती अम्मन मंदिर और विवेकानंद रॉक मेमोरियल

कन्याकुमारी यात्रा (भाग 2) :
भगवती अम्मन मंदिर और विवेकानंद रॉक मेमोरियल 




विवेकनन्द आश्रम में स्थित सनराइज व्यू पॉइंट से सूर्योदय का विस्मरणीय और मनमोहक नजारा देखने के बाद आइये अब हम चलते है भगवती अम्मन मदिर, विवेकानंद रॉक मेमोरियल और फिर उसके बाद कुछ और जगहों की सैर करेंगे। 8 बज चुके थे और हम अपने कमरे से निकलकर उस जगह पर आकर बस का इंतज़ार करने लगे जहाँ से आश्रम की बसें यहाँ आने वाले लोगों को लेकर संगम तक जाती है। बस आने का समय 9:30 बजे था और फिर यहाँ से जाने का समय 10:30 बजे था। 2 घंटे तक यहाँ बैठकर इतंजार करना तो ठीक बिलकुल भी नहीं था तो हमने ऑटो से जाना ही अच्छा समझा। अब सड़क पर होते तो कोई ऑटो बहुत आसानी से मिल जाती पर आश्रम के अंदर ऑटो तभी आती है जब वो किसी को यहाँ छोड़ने आया हो। कुछ मिनट के इंतज़ार के बाद भी जब कोई ऑटो नहीं आया तो हम पैदल ही चल पड़े। अभी कुछ ही कदम चले थे कि एक ऑटो आता हुआ दिखाई दिया जो कुछ लोगो को स्टेशन से लेकर यहाँ आया था। हमने उस ऑटो वाले को संगम तक छोड़ने को कहा तो उसने 5 आदमी का 50 रुपये  माँगा। हम भी ख़ुशी खुशी ऑटो बैठ गए और करीब 10 मिनट के सफर के बाद हम उस जगह पर पहुंच गए जहाँ से एक रास्ता मंदिर की तरफ और एक विवेकनन्द रॉक मेमोरियल की तरफ जाता है और किसी भी प्रकार की गाड़ी का यहाँ से आगे जाना निषेध है।

Friday, September 8, 2017

कन्याकुमारी यात्रा (भाग 1) : सनराइज व्यू पॉइंट

कन्याकुमारी यात्रा (भाग 1) : सनराइज व्यू पॉइंट



रामश्वेरम में जो ट्रेन में बैठे तो कन्याकुमारी पहुंचने से कुछ मिनट पहले ही नींद खुली। घड़ी देखा तो सुबह के 4 बजने वाले थे मतलब ट्रेन पहुंचने ही वाली थी क्योंकि ट्रेन के पहुंचने का समय 4 बजकर 5 मिनट था और देखते ही देखते ट्रेन अपने समय से कुछ पहले ही स्टेशन पहुंच गई। लोग ट्रेन से उतरने के लिए आपा धापी करने लगे, पर हमें कोई जल्दबाजी नहीं थी क्योंकि कन्याकुमारी इस ट्रेन का गंतव्य स्टेशन था और वैसे भी कन्याकुमारी आने वाली हरेक ट्रेन का ये गंतव्य स्टेशन ही होता है। सब लोगों के ट्रेन से उतर जाने के बाद हम आराम से ट्रेन से उतरे और स्टेशन से बाहर आ गए। अभी 4 बजे थे और हर तरफ घना अँधेरा था। यहाँ से हमें विवेकानंद आश्रम जाना था जहाँ पहले से हमने कमरा बुक करवा रखा था। स्टेशन से बाहर आया तो ऑटो वाला कोई 200 तो कोई 150 मांग रहा था और ये मेरे हिसाब से बहुत ज्यादा था क्योंकि मेरे एक घुम्मकड़ मित्र नरेंद्र शेलोकर ने जैसा बताया था उस हिसाब से 50 रूपये में कोई भी ऑटो वाला स्टेशन से विवेकानंद आश्रम पहुंचा देगा और हुआ भी यही। कुछ मिनट इंतज़ार के बाद एक ऑटो वाला खुद ही 50 रुपये में आश्रम पहुँचाने के लिए तैयार हो गया। जब ऑटो वाला खुद ही 50 रूपये मांगे तो मोल-तोल करने की भी कोई आवश्यकता नहीं थी और हम ऑटो में बैठ गए और करीब 10 मिनट में ही आश्रम पहुंच गए। 

Friday, September 1, 2017

रामेश्वरम यात्रा (भाग 2): धनुषकोडि बीच और अन्य स्थल

रामेश्वरम यात्रा (भाग 2): धनुषकोडि बीच और अन्य स्थल



रामेश्वरम मंदिर में दर्शन के बाद आइये अब चलते हैं रामेश्वरम के अन्य दर्शनीय स्थानों का भ्रमण करते हैं। मंदिर में दर्शन, पूजा-पाठ, कुछ शॉपिंग आदि करते-करते 10:30 बज चुके थे। लोगों से पूछने पर पता चला कि अन्य स्थानों पर जाने के लिए बस या ऑटो अग्नितीर्थम के पास ही मिलेंगे तो हम एक बार फिर से अग्नितीर्थम के पास आ गए। यहाँ कुछ ऑटो वाले खड़े थे जो रामेश्वरम घूमने के लिए लोगों से पूछ रहे थे। हमने कई ऑटो वाले से बात किया तो सबने सब जगह घुमाकर फिर से यहीं पर या रेलवे स्टेशन तक छोड़ने के लिए 500 रुपए की मांग की। पैसे तो वो ज्यादा नहीं मांग रहे थे पर समय 2 घंटे से ज्यादा देने के लिए तैयार नहीं थे, पर 2 घंटे में इतनी जगह घूम पाना बिल्कुल ही असंभव था। बहुत करने पर एक ऑटो वाला 2:30 घंटे समय देने के लिए तैयार हुआ पर इतना समय भी बिल्कुल अपर्याप्त था, लेकिन ऑटो वाले इस बात की गारंटी ले रहे थे कि इतने समय में सब पूरा हो जायेगा और यदि उनकी बात मानकर हम चले भी जाते हैं तो चेन्नई की तरह यहाँ भी लफड़ा होना निश्चित था। यही सब सोचकर मैंने बस से ही जाना उचित समझा और एक दुकान से पानी लिया और बातों बातों में उनसे बस के बारे में कुछ जानकारी ले लिया और चल पड़े बस स्टैंड के ओर।  

Friday, August 25, 2017

रामेश्वरम यात्रा (भाग 1) : ज्योतिर्लिंग दर्शन

रामेश्वरम यात्रा (भाग 1) : ज्योतिर्लिंग दर्शन 





आज से एक साल पहले जब हमने भारत के उत्तर में हिमालय पर स्थित केदारनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शन किये थे तो ये सोचा भी नहीं था कि एक साल बाद देश के सबसे दक्षिण में स्थित भगवान शंकर के एक और ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त होगा। रामेश्वरम महादेव के ज्योतिर्लिंग के साथ साथ भगवान् विष्णु के चार धामों में से एक धाम भी है। रामेश्वरम शहर के पूर्वी भाग में स्थित श्री रामनाथ स्वामी मंदिर की ऊंची ऊंची दीवारें, सुन्दर कलाकारी से सजे हुए स्तम्भों की श्रृंखलाएं, बुलंद और सजे धजे गोपुरम (मंदिर का प्रवेश द्वार) के साथ साथ विशालकाय नंदी को देखना किसी सुन्दर कल्पना के सच होने जैसा लगता है। मंदिर का खूबसूरत विशाल गलियारा जिसे एशिया में मौजूद हिन्दू मंदिरों में सबसे लम्बा गलियारा होने का दर्जा प्राप्त है। यहाँ दो शिवलिंग की पूजा होती है, एक वो जिन्हें हनुमान जी कैलाश से लेकर आये थे और उसे विश्वलिंगम कहा जाता है जबकि दूसरे को जिसे भगवान राम ने बनाया था जिसे रामलिंगम कहा जाता है। मन्दिर परिसर में 24 कुंड है, जिसमें से 2 कुंड सुख चुके हैं और 22 कुंडों में पानी है पर यहाँ आने वाले लोगों को 21 कुंड के पानी से ही स्नान कराया जाता है क्योंकि 22वें कुंड में सभी कुंडों का पानी है। कुछ लोग जो लोग इन सभी कुंडों में नहीं करना चाहें उनके लिए इस 22वें कुंड में स्नान करना ही पर्याप्त है। इन सभी कुंडों के नाम रामायण और महाभारत कालीन लोगों के नाम पर रखे हैं जैसे अर्जुन तीर्थ, नल तीर्थ, नील तीर्थ, गायत्री तीर्थ, सावित्री तीर्थ और सरस्वती तीर्थ, गंगा-जमुना तीर्थ,आदि आदि। मंदिर में दर्शन के लिए आने वाले भक्तगण इन कुंडों में स्नान के पश्चात ही मंदिर में दर्शन के लिए जाते है, वैसे इसके लिए कोई बाध्यता नहीं है, बिना इसमें स्नान के भी दर्शन किया जा सकता है। यहाँ आने वाले श्रद्धालु चाहे इन कुंड में स्नान करें या न करें पर मंदिर से करीब 200 मीटर की दूरी पर यहाँ के महत्वपूर्ण स्नान अग्नितीर्थम (समुद्र) में स्नान जरूर करते हैं।

Friday, August 11, 2017

तिरुपति से चेन्नई होते हुए रामेश्वरम की ट्रेन यात्रा

तिरुपति से चेन्नई होते हुए रामेश्वरम की ट्रेन यात्रा 






तिरुमला स्थित भगवान् वेंकटेश्वर और तिरुपति स्थित देवी पद्मावती के दर्शन करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के पश्चात हमारा अगला पड़ाव रामेश्वरम था, जिसके लिए हमें पहले तिरुपति से चेन्नई सेंट्रल तक एक ट्रेन के सफर के बाद चेन्नई एग्मोर से रामेश्वरम तक का सफर दूसरे ट्रेन से करना था। दोनों ट्रेन की हमारी बुकिंग पहले से ही थी इसलिए सीट की भी कोई चिंता नहीं थी। पद्मावती मंदिर के दर्शन करके मन में एक नई ऊर्जा भर गई थी, क्योंकि इस जगह पर जाने के लिए न तो मैंने सोचा था और न ही यहाँ जाने की कोई योजना थी और हम थोड़े से खाली समय का सदुपयोग करके इस मंदिर के दर्शन भी कर लिया। शायद इस मंदिर के दर्शन न करता और बाद में लोगों से ये सुनता कि जितना समय हमारे पास था उससे कम समय में इस मंदिर के दर्शन किये जा सकते थे तो बाद में बहुत अफ़सोस होता, पर अब कोई अफ़सोस नहीं था। अब अगर कुछ था तो एक नयी ऊर्जा के साथ आगे की यात्रा के लिए बढ़ना। हमारी ट्रेन 10 बजे थे और 9:30 बज चुका था और हमें यहाँ से निकलकर स्टेशन के लिए प्रस्थान करने का समय हो चुका था। 

Friday, August 4, 2017

देवी पद्मावती मंदिर (तिरुपति) यात्रा और दर्शन

देवी पद्मावती मंदिर (तिरुपति) यात्रा और दर्शन



तिरुमला की सप्तगिरि पहाड़ियों में स्थित भगवान् वेंकटेश के दर्शन के उपरांत हम कल ही तिरुमला से तिरुपति आ गए थे और आज हमें तिरुपति से चेन्नई होते हुए रामेश्वरम जाना था। हमारी ट्रेन दिन में 10 बजे थी और प्लान तो यही था कि सुबह सुबह तिरुपति शहर में एक दो घंटे घूमने के बाद निर्धारित समय पर स्टेशन पहुंचना है, पर एक मित्र के सुझाव के अनुसार मुझे अपनी योजना बदलनी पड़ी। अब हम तिरुपति के बाज़ारों में भटकने के बजाय देवी पद्मावती के दर्शन के लिए जाना था। वैसे तो पद्मावती मंदिर के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी थी कि ये मंदिर तिरुपति में स्थित है पर यहाँ कैसे जाएं और जाने के बाद कितना टाइम लगेगा ये सब पता नहीं होने के कारण मैंने इसे अपनी योजना में शामिल नहीं किया था। कभी कभी बिना सोचे हुए भी कुछ हो जाता है और यही मेरे साथ हुआ। कल रात में एक मित्र नरेंद्र शोलेकर ने मुझे पद्मावती मंदिर और वहां जाने के बारे में बताया और मैं वहां जाने को झट तैयार हो गया। शायद उनका मार्गदर्शन न होता तो शायद इस मंदिर के दर्शन से मैं वंचित रह जाता। 

Friday, July 28, 2017

तिरुपति बालाजी (वेंकटेश्ववर भगवान, तिरुमला) दर्शन

तिरुपति बालाजी (वेंकटेश्ववर भगवान, तिरुमला) दर्शन





एक बहुत लम्बे इंतज़ार और लम्बे सफर के बाद हम आज उस जगह पर पहुंचे हुए थे, जहाँ हर दिन लाख लोग अपनी अपनी मुरादें लेकर आते रहते हैं लेकिन मैं यहाँ कोई मुराद या मन्नत लेकर नहीं आया था, मैं तो बस उस दिव्य जगह के दिव्य दर्शन के लिए यहाँ आया था। हर दिन सोचा करता था कि आखिर ऐसा क्या है उस जगह पर जहाँ हर दिन इतने सारे लोग जाते हैं और आज हम भी उसी जगह पर पहुंचे हुए हैं। शहरों की भाग दौड़ वाली जिंदगी से दूर यहाँ एक अलग ही शांति थी और इतने सारे लोग एक दूसरे से अनजान होते हुए भी अनजान नहीं दिख रहे थे। यहाँ एक साथ पूरे देश से आये हुए लोग देखे जा सकते हैं। सबकी अलग भाषा, अलग रहन सहन, अलग खान पान होते हुए भी यहाँ सब एक ही रंग में रंगे हुए नज़र आ रहे थे और वो रंग था भक्ति का। इस भीड़ में कुछ दूसरे देश के लोग भी दिखाई दे जाते थे और वो भी यहाँ आकर भक्ति के रंग में सराबोर थे। यहाँ आया हुआ हर व्यक्ति देश, राज्य, जाति, वर्ग, गरीब, अमीर को भूल कर बस भक्ति में लीन अपनी ही धुन में चला जा रहा था। यहाँ की स्थिति को देखकर मन में बस एक ही ख्याल आ रहा था कि काश हर जगह बस ऐसी ही शांति हो, जहाँ कोई किसी के आगे या पीछे न होकर बस एक साथ चल रहे हों। 

Friday, July 21, 2017

चेन्नई से तिरुमला

चेन्नई से तिरुमला


चेन्नई के बाद हमारा अगला पड़ाव तिरुमला था, जहाँ पहुँच कर रात में रुकना था और अगले दिन भगवान वेंकटेश्वर के दर्शन करना था। चेन्नई से तिरुपति तक का सफर ट्रेन और तिरुपति से तिरुमला तक का सफर बस से करना था। भगवान वेंकटेश्वर का मंदिर तिरुमला की पहाड़ियों में स्थित है जो तिरुपति से बस से द्वारा 22 किलोमीटर और पैदल जाने वाले के लिए 10 किलोमीटर की चढ़ाई है। तिरुपति से तिरुमला पर्वत पर गाड़ियों के लिए जाने का अलग और आने का अलग मार्ग है, मतलब एकतरफा रास्ता है। वैसे चेन्नई से तिरुपति तक बस या ट्रेन दोनों से जाया जा सकता है। चेन्नई से तिरुपति की बसें बहुतायत में मिलती है। तिरुपति के पास में रेलवे का बड़ा स्टेशन रेनिगुंटा है, जहाँ के लिए चेन्नई से दर्जन भर से ज्यादा ट्रेनें है पर तिरुपति के लिए कुछ ही ट्रेन है।आप अगर ट्रेन से जा रहे हैं तो रेनिगुंटा या तिरुपति दोनों जगह से आपको तिरुमला के लिए बस और जीप बहुत आसानी से और बहुतायत में मिलती है। चेन्नई से तिरुपति की हमारी ट्रेन दोपहर 2:15 बजे थी और करीब 1:30 बजे हम वेटिंग रूम से प्लेटफार्म पर आकर ट्रेन का इंतज़ार करने लगे। 

Friday, July 14, 2017

मरीना बीच, चेन्नई (Marina Beach, Chennai)

मरीना बीच, चेन्नई (Marina Beach, Chennai)





सुबह 7 बजे चेन्नई सेंट्रल रेलवे स्टेशन पर ट्रेन से उतरते ही हमारे सफर का पहला पड़ाव पूरा हो चुका था। यहाँ से आगे का हमारा अगला पड़ाव तिरुमला था, जिसका सफर हमें चेन्नई से तिरुपति तक ट्रेन से और उसके आगे तिरुपति से तिरुमला तक बस से तय करना था। चेन्नई से तिरुपति जाने वाली हमारी ट्रेन दोपहर बाद 2:15 बजे थी और अभी सुबह के 7 ही बजे थे मतलब मेरे पास 7 घंटे का समय था। अब 7 घंटे स्टेशन पर बैठ कर व्यतीत करना मुझे उचित नहीं लगा। अब बात ये थी कि जाएँ तो जाएं कहाँ। चेन्नई में कहीं जाना या रुकना नहीं था इसलिए यहाँ के लिए कुछ सोचा नहीं था। सोच कर तो यही आये थे कि ट्रेन 2-4 घंटे दो देर होगी ही, पर ट्रेन ने समयानुसार मुझे चेन्नई पंहुचा दिया इसलिए अभी मेरे साथ 'किं कर्तव्य विमूढ़' वाली स्थिति पैदा हो गयी थी। हम सोचने में लगे हुए और समय अपनी ही गति से चला जा रहा था। 

Friday, July 7, 2017

दिल्ली से चेन्नई : एक लम्बी ट्रेन यात्रा

दिल्ली से चेन्नई : एक लम्बी ट्रेन यात्रा



4 महीने से जिस दिन का इंतज़ार कर रहा था आख़िरकार वो दिन आ गया। आज रात 10 बजे तमिलनाडु एक्सप्रेस से चेन्नई के लिए प्रस्थान करना था। मम्मी पापा एक दिन पहले ही दिल्ली पहुंच चुके थे। यात्रा की सारी तैयारियां भी लगभग पूरी हो चुकी थी। मैं सुबह समय से ऑफिस  के लिए निकल गया। चूंकि ट्रेन रात में 10:30 बजे थी इसलिए ऑफिस से भी समय से पहले निकलने की कोई जल्दी नहीं थी, पर ये घुम्मकड़ मन कहाँ मानता है और 4 बजे ही ऑफिस से निकल गया। घर आकर तैयारियों का जायजा लिया और बची हुई तैयारियों में लग गया। 7 बजे तक सब कुछ तैयार था, बस अब जाते समय सामान उठाकर निकल जाना था। साढ़े सात बजे तक सब लोग खाना भी खा चुके और 9 बजने का इंतज़ार करने लगे। अभी एक घंटा समय हमारे पास बचा हुआ था और इस एक घंटे में मेरे मन में अच्छे-बुरे खयाल आ रहे थे, अनजान जगह पर जहाँ भाषा की समस्या सबसे ज्यादा परेशान करती है उन जगहों पर पता नहीं क्या क्या समस्या आएगी। इसी उधेड़बुन में कब एक घंटा बीत गया पता नहीं चला।

Friday, June 30, 2017

दक्षिण भारत यात्रा की शुरुआत

दक्षिण भारत यात्रा की शुरुआत



करीब 3 साल पहले तिरुपति जाने का विचार किया था पर तब से वहां जाने का समय नहीं निकाल पाया।समय नहीं निकल पाने का कारण भी कम रोचक नहीं है। जब भी तिरुपति जाने की बात घर में करता तो पत्नी साथ साथ रामेश्वरम भी निपटा लेने की बात कहती। उसके बाद मैं भी कुछ और जोड़ देता कि जब तिरुपति और रामेश्वरम निपटा ही देना है तो मदुरै का मीनाक्षी मंदिर और कन्याकुमारी को क्यों छोड़ें, लगे हाथ यहाँ भी हो लें और इसी चक्कर में योजना बन ही नहीं पा रही थी। गर्मियों में उधर पड़ने वाली भयंकर गर्मी के कारण उधर जाने का सोच भी नहीं सकता था और सर्दियों में इतनी लम्बी छुट्टी मिल पाना भी मुमकिन नहीं था। इसी बीच केदार-बदरी यात्रा भी कर ली पर तिरुपति जाने का समय निकल नहीं पाया।

Wednesday, June 21, 2017

केदारनाथ से वापसी

केदारनाथ से वापसी 

पाँचवाँ दिन

कल जिस उमंग और उत्साह से गौरीकुंड से केदारनाथ आये थे आज उसके विपरीत उदास और भारी मन से केदारनाथ से वापसी  की राह पकड़नी थी। यहाँ से जाने का मन तो नहीं हो रहा था पर वापस तो जाना ही था। आज हमारी यात्रा केदारनाथ से गौरीकुंड तक पैदल मार्ग और उसके आगे गौरीकुंड से गौचर तक बस यात्रा की थी। 

4 दिन तक जो 3 बजे ही जागने की आदत हो गयी थी उसके वजह से आज हम बिना अलार्म बजे ही 3 बजे जग गए। सारा सामान पैक किया और सारी तैयारी करते करते 4 :30 हो गए थे। अब हम निकलने की सोच ही रहे थे कि एक आदमी चाय की बड़ी से केतली लेकर आया जो हरेक हट जिसमें लाइट जल रही थी उसमें चाय दे रहा था। उसने हम लोगों को भी चाय दी। उसके चाय की कीमत जो थी बहुत ही आश्चर्यजनक थी। एक कप चाय केवल 10 रुपए। इतनी ऊँचाई पर 10 रुपए में चाय बहुत कम लग रही थी। यहाँ तो उसकी कीमत 20 रुपए भी होती तो कम होती। उसके बाद मैंने उससे पूछा कि जाने से पहले किसे बताना होगा तब उसने कहा कि किसी को बताने की जरुरत नहीं है आप अपना सामान लेकर जा सकते हैं। उसके बाद वो दूसरे को चाय देने चला गया।

Monday, June 19, 2017

मुगल गार्डन, दिल्ली (Mughal Garden, Delhi)

मुगल गार्डन, दिल्ली (Mughal Garden, Delhi)

12 मार्च 2017
इस साल मुझे दूसरी बार मुग़ल गार्डन जाने का मौका मिला। पहली बार मुग़ल गार्डन फरवरी 2015 में गया था और आज 2 साल बाद एक बार फिर वहां जाने जाने का मौका मिला।  मुग़ल गार्डन राष्ट्रपति भवन के पीछे के भाग में स्थित है। यहाँ जितने प्रकार के फूलों प्रजातियां है शायद देश के किसी भी उद्यान में फूलों की  इतनी प्रजातियां नहीं होगी, और हो भी क्यों नहीं आखिर इतने बड़े देश के राष्ट्रपति (राजा) का बगीचा जो है। बसंत के मौसम में इस गार्डन की सुंदरता अपने शबाब पर होती है, और यही वो समय होता है  जब इसे आम लोगों के लिए खोला जाता है। वैसे यहाँ आम लोगों के लिए साल में 11 महीने प्रवेश निषिद्ध है पर साल में एक महीने मध्य फरवरी से मध्य मार्च तक (दो चार दिन आगे पीछे) मुग़ल गार्डन पूरे देश के नागरिकों के लिए खुला रहता है।

Saturday, May 20, 2017

पठानकोट से दिल्ली (Pathankot to Delhi)

पठानकोट से दिल्ली (Pathankot to Delhi)


इस पोस्ट को लिखने से पहले मैं बार बार यही सोच रहा था कि मैं अगर इससे पीछे वाली पोस्ट को ही अगर मैं थोड़ा और बड़ा कर देता तो ये पोस्ट लिखनी नहीं पड़ती, और अगर उसी पोस्ट में इसे जोड़ भी देता तो शायद पोस्ट लम्बी और उबाऊ हो जाती।  खैर रहने दीजिये इन बातों को, इन बातों का कोई निष्कर्ष तो निकलने वाला है नहीं तो उसके बारे में बोलने या लिखने से क्या फायदा। अब आज की यात्रा की बात करते हैं। 

5 दिन पहले में जिस सफर की शुरुआत की थी आज उसके अंजाम तक पहुँचने का दिन आ चुका था। कल पूरे दिन बस और ट्रेन का सफर (करीब 110 किलोमीटर बस और करीब 220 किलोमीटर ट्रेन का सफर) और इधर उधर की भागा-दौड़ी का ये प्रभाव हुआ कि आज सुबह उठने का मन बिलकुल नहीं हो रहा था। 4 :30 बजे अलार्म बजने के साथ ही नींद टूटी तो मैं अलार्म बंद करके फिर सो गया, दूसरी बार अलार्म 5:00 बजे बजा तो उठा और 5:30 बजते बजते जल्दी जल्दी नहा धोकर तैयार हुआ और ये सोचकर स्टेशन से बाहर गया कि कुछ खा-पी लिया जाये क्योकि ट्रेन पर का खाना मुझे बिलकुल पसंद नहीं है, यदि यहाँ नहीं खाया तो पूरे दिन बिना कुछ खाये ही रहना पड़ेगा। स्टेशन से बाहर जाकर भी निराशा ही हाथ लगी, एक चाय की दुकान तक नहीं खुली थी, इधर उधर देखा और कुछ दूर तक भी गया फिर भी कुछ खाने पीने के लिए नहीं मिला। एक कहावत है न कि अपना सा मुँह बना लेना, वही मेरे साथ हुआ, जिसे फुर्ती से मैं स्टेशन से बाहर चाय पीने गया था और कुछ न मिलने के कारण उसी फुर्ती से मुँह बना कर वापस आ गया। 

Saturday, May 6, 2017

बैजनाथ महादेव से पठानकोट (Baijnath to Pathankot)

बैजनाथ महादेव से पठानकोट 
(Baijnath to Pathankot)




इतने दिन से घूमते हुए अब वो घड़ी आ गयी जब हमें वापस जाना होगा। ज्वालादेवी, धर्मशाला, मैक्लोडगंज, भागसू नाग वाटर फॉल, चिंतपूर्णी देवी और बैजनाथ महादेव की यात्रा पूरी करके और कुछ खट्टी-मीठी यादें लेकर और कुछ को अपने कैमरे में कैद करके बुझे मन से वापसी की राह पकड़नी थी। बैजनाथ मंदिर देखने के बाद वहां से बस से हम पपरोला आ चुके थे। 

पपरोला बस स्टैंड से रेलवे स्टेशन की दूरी महज 100 मीटर ही है। मैं स्टेशन पंहुचा तो यहाँ का नज़ारा ऐसा लग रहा था जैसे हम किसी निर्जन प्रदेश में आ गए। स्टेशन के बाहर-भीतर और यहाँ तक प्लेटफार्म पर भी कोई मानव नहीं दिख रहा था, अरे मानव तो क्या कोई और जंतु भी दिख जाता तो लगता कि कुछ दिखा। अगर कुछ दिख रहा था यार्ड में खड़ी ट्रेन की 2 इंजन और ट्रेनें। मन तो कर रहा था कि स्टेशन के बोर्ड पर जो "बैजनाथ पपरोला" लिखा हुआ है उसे मिटाकर "निर्जन पपरोला" कर दें, पर ऐसा करना सरकारी संपत्ति का नुकसान करना होता, इसलिए नहीं लिखे। 

Thursday, May 4, 2017

बैजनाथ महादेव (Baijnath Mahadev), हिमाचल प्रदेश

बैजनाथ महादेव, पालमपुर
(Baijnath Mahadev, Palampur)

सबसे पहले आपको आज की योजना के बारे में बता दूँ। आज की मेरी योजना चिंतपूर्णी देवी से सीधे बैजनाथ जाने की है। साधन कुछ हो हो सकता है। चिंतपूर्णी देवी से ज्वालामुखी रोड तक बस से और वहां से ट्रेन से या फिर चिंतपूर्णी देवी से सीधे बैजनाथ तक बस से। उसके बाद 2:30 बजे वाली ट्रेन से बैजनाथ से पठानकोट और रात में पठानकोट में विश्राम और अगले दिन सुबह दिल्ली के लिए रवाना।

Tuesday, May 2, 2017

चिंतपूर्णी देवी (Chintpoorni Devi)

चिंतपूर्णी देवी (Chintpoorni Devi)




वैसे तो मुझे कहाँ जाना है इसके बारे में कोई योजना तो थी नहीं। बस जिधर मन हुआ उधर चले जाना था। पर फिर भी मैक्लोडगंज में बस पर बैठते ही मैंने चिंतपूर्णी देवी जाने का सोचा। इस समय 1:45 बजे थे।  बस चली और 2 :15 बजे हम धर्मशाला पहुँच गए।  वहां उतरे तो देखा कि ज्वाला देवी जाने के लिए एक बस जाने के लिए तैयार खड़ी है। मैं बस में घुसा और सबसे आगे की सीट पर बैठ गया। बस 2 मिनट में ही ज्वाला देवी के लिए चली।  कंडक्टर के आने पर मैंने उसे कहा कि मुझे चिंतपूर्णी देवी जाना है इसलिए आप मुझे काँगड़ा की टिकट दे दो, वहां से मैं दूसरी बस से चिंतपूर्णी देवी चला जाऊँगा। मेरी इस बात का उसने रुखा सा जवाब दिया कि काँगड़ा से चिंतपूर्णी देवी की बस नहीं मिलती है, इसी बस से आपको ज्वालादेवी जाना होगा फिर वहाँ से आपको चिंतपूर्णी देवी की बस मिलेगी।  फिर भी मैंने काँगड़ा का ही टिकट लिया कि जो होगा देखा जाएगा अगर बस नहीं मिली तो जहाँ रात होगी वहीं सो जाएंगे। खैर करीब 3 बजे हम काँगड़ा पहुंच गए।  वहां बस पर से ही एक बस दिखी जो चिंतपूर्णी देवी जा रही थी।  मैं इस बस से उतरा और उस बस में बैठ गया। 

Tuesday, April 25, 2017

भागसू नाग मंदिर और झरना (Bhagsu Naag Temple and Waterfall)

भागसू नाग मंदिर और झरना
(Bhagsu Naag Temple and Waterfall)


भागसू नाग मंदिर और झरना, मैक्लोडगंज (Bhagsu Naag Temple and Waterfall, McLeodganj)

काँगड़ा से धर्मशाला पहुंचकर बस से उतरने के बाद आने के बाद कुछ इधर उधर घूमा और फिर मैक्लोडगंज जाने वाली बस में जाकर बैठ गया। अभी 11 बजे थे। बस खुलने ही वाली थी। वैसे ये बस मैक्लोडगंज से आगे नड्डी गांव तक जा रही थी। नड्डी गांव गाड़ियों का अंतिम गंतव्य स्थल है इससे आगे कोई गाड़ी नहीं जाती। 11:30 बजे बस मैक्लोडगंज पहुँच गयी। हम बस से उतरकर बिना किसी से पूछे जिस और कुछ लोग जा रहे थे उधर ही चल दिए।  बस स्टैंड ऐसे बना हुआ था जैसे एक बड़ी से बिल्डिंग हो। मैं सीढिया चढ़कर ऊपर पहुँचा। वहीं बहुत सारी टैक्सियां खड़ी जो पर्यटकों के इंतज़ार में थी। ऐसा लग रहा था कि यही जगह मैक्लोडगंज का मुख्य बाजार है। पूरा चहल-पहल था।  यहीं से आगे तीन रास्ते थे।  मैं बिना किसी से कुछ पूछे ऐसे ही बीच वाली सड़क पर चलने लगा। बाजार पर करने के बाद रास्ता बेहद ही मनभावन और शांति लिए हुए था। दूर पैराग्लइडिंग करते हुए लोग दिख रहे थे। 

Tuesday, April 18, 2017

धर्मशाला : हिमाचल का गहना (Dharamshala)

धर्मशाला : हिमाचल का गहना (Dharamshala)


कल पूरे दिन के सफर की थकान और बिना खाये पूरे दिन रहने के बाद रात को खाना खाने के बाद जो नींद आयी वो एक ही बार 4:30 बजे मोबाइल में अलार्म बजने के साथ ही खुला। बिस्तर से उठकर जल्दी से मैं नहाने की तैयारी में लग गया। फटाफट नहा-धोकर तैयार हुआ और सारा सामान पैक किया। इतना करते करते 5 :30 बज गए। अब कल की योजना के मुताबिक एक बार फिर माँ ज्वालादेवी के दर्शन के लिए चल दिया। बाहर घुप्प अँधेरा था। इक्का-दुक्का लोग ही मंदिर के रास्ते पर मिल रहे थे। कुछ देर में हम मंदिर पहुँच गए। यहाँ मुश्किल से इस समय 25 -30 लोग ही थी। अभी मंदिर खुलने में कुछ समय था। कुछ देर में आरती आरम्भ हो गयी। आरती समाप्त होते होते मेरे पीछे करीब 300 से 400 लोगों की भीड़ जमा हो चुकी थी। आरती के बाद 6:30 पर मंदिर के कपाट खोल दिए गए। बारी बारी से श्रद्धालु एक एक करके मंदिर में प्रवेश कर रहे थे और दर्शन के बाद दूसरे दरवाजे से निकल रहे थे। 20 मिनट में मेरी बारी आयी तो मैंने भी एक बार फिर से दर्शन किये। 7 :00 बज चुके थे उसके बाद सीधा मैं गेस्ट हाउस आया और अपने बैग उठाकर नीचे आया। यहाँ से मुझे बस से ज्वालामुखी रोड जाना था उसके बाद वहां से ट्रेन से बैजनाथ जाना था।

Friday, April 14, 2017

ज्वालादेवी धाम (Jwaladevi Dham)

ज्वालादेवी धाम (Jwaladevi Dham)



ज्वालाजी मंदिर को ज्वालामुखी मंदिर भी कहते हैं ! ज्वालाजी मंदिर को भारत के 51 शक्तिपीठ में गिना जाता है ! लगभग एक टीले पर बने इस मंदिर की देखभाल का जिम्मा बाबा गोरखनाथ के अनुयायियों के जिम्मे है ! कहा जाता है की इसके ऊपर की चोटी को अकबर ने और शोभायमान कराया था ! इसमें एक पवित्र ज्वाला सदैव जलती रहती है जो माँ के प्रत्यक्ष होने का प्रमाण देती है ! ऐसा कहा जाता है कि माँ दुर्गा के परम भक्त कांगड़ा के राजा भूमि चन्द कटोच को एक सपना आया , उस सपने को उन्होंने मंत्रियों को बताया तो उनके बताये गए विवरण के अनुसार उस स्थान की खोज हुई और ये जगह मिल गयी , जहां लगातार ज्वाला प्रज्वलित होती है ! ये ही ज्वाला से इस मंदिर का नाम ज्वाला जी या ज्वालामुखी हुआ ! इस मंदिर में कोई मूर्ति नहीं है बल्कि प्राकृतिक रूप से निकलती ज्वाला की ही पूजा होती है ! एक आयताकार कुण्ड सा बना है जिसमें 2-3 आदमी खड़े रहते हैं !

Thursday, April 13, 2017

दिल्ली से हरिद्वार और श्रीनगर (Delhi to Haridwar and Srinagar)

दिल्ली से हरिद्वार और श्रीनगर
(Delhi to Haridwar and Srinagar)

पहला दिन 

यात्रा की सारी तैयारी हमलोगों ने पहले ही कर ली थी। 3 जून को मम्मी पापा का पटना से टिकट था और 4 जून को सुबह वो लोग दिल्ली पहुँच गए। उनकी ट्रेन आने से पहले ही मैं रेलवे स्टेशन पहुंच गया।  ट्रेन समय से आ गई। उनलोगों को लाने के बाद मैं अपने ऑफिस के लिए निकल गया। ऑफिस से 4 बजे ही निकल गया। घर आकर सारी तैयारीयों का जायजा लिया और फिर यात्रा की तैयारी में व्यस्त हो गया। हमारी हरिद्वार की ट्रेन पुरानी दिल्ली स्टेशन से रात्रि में 10:10 पर थी। सबका विचार था की घर से खाना खाकर 9 बजे निकला जाये। 9 बजे निकलने पर या तो मेट्रो या बस से से जाना पड़ता उसमें भी एक जगह बदलना पड़ता और 7 बजे वाली पैसेंजर ट्रेन से चले जाने पर न तो कही बदलने की समस्या न ही भीड़ में धक्का मुक्की। अंत में यही तय हुआ कि 7 बजे ही निकला जाये और स्टेशन पर ही खाना खाया जाये।