Friday, July 21, 2017

चेन्नई से तिरुमला

चेन्नई से तिरुमला


चेन्नई के बाद हमारा अगला पड़ाव तिरुमला था, जहाँ पहुँच कर रात में रुकना था और अगले दिन भगवान वेंकटेश्वर के दर्शन करना था। चेन्नई से तिरुपति तक का सफर ट्रेन और तिरुपति से तिरुमला तक का सफर बस से करना था। भगवान वेंकटेश्वर का मंदिर तिरुमला की पहाड़ियों में स्थित है जो तिरुपति से बस से द्वारा 22 किलोमीटर और पैदल जाने वाले के लिए 10 किलोमीटर की चढ़ाई है। तिरुपति से तिरुमला पर्वत पर गाड़ियों के लिए जाने का अलग और आने का अलग मार्ग है, मतलब एकतरफा रास्ता है। वैसे चेन्नई से तिरुपति तक बस या ट्रेन दोनों से जाया जा सकता है। चेन्नई से तिरुपति की बसें बहुतायत में मिलती है। तिरुपति के पास में रेलवे का बड़ा स्टेशन रेनिगुंटा है, जहाँ के लिए चेन्नई से दर्जन भर से ज्यादा ट्रेनें है पर तिरुपति के लिए कुछ ही ट्रेन है।आप अगर ट्रेन से जा रहे हैं तो रेनिगुंटा या तिरुपति दोनों जगह से आपको तिरुमला के लिए बस और जीप बहुत आसानी से और बहुतायत में मिलती है। चेन्नई से तिरुपति की हमारी ट्रेन दोपहर 2:15 बजे थी और करीब 1:30 बजे हम वेटिंग रूम से प्लेटफार्म पर आकर ट्रेन का इंतज़ार करने लगे। 


ठीक 2 बजे ट्रेन प्लेटफार्म पर आ गयी और ट्रेन के आते ही हम लोग अपनी अपनी सीट कर कब्ज़ा जमा कर बैठ गए। कुछ देर ट्रेन अपने निर्धारित समय से 15 मिनट की देरी से 2:30 बजे तिरुपति के लिए प्रस्थान कर गई। ट्रेन के स्टेशन से बाहर निकलते ही मैं कैमरा लेकर गेट पर आ गया कि कुछ स्टेशन के फोटो ले सकूँ। चेन्नई से तिरुपति के बीच करीब आधी दूरी तक रेलवे के चार ट्रेक हैं, जिनमें से 2 ट्रेक पर एक्सप्रेस ट्रेनें चलती हैं और शेष दो पर पैसेंजर ट्रेनें और मालगाड़ियां। हमारी ट्रेन बिलकुल अपनी पूरी गति से चली जा रही थी और इसकी गति को देखकर ये साफ प्रतीत हो रहा था कि अपने समय से देर खुलने के बाद भी अपने गंतव्य तक समय पर पहुँच जाएगी। इसी बीच कुछ छोटे छोटे स्टेशनों से गुजरती हुई हमारी ट्रेन अपने पहले पड़ाव तिरुवल्लुर स्टेशन पर पहुँच गई। कुछ ही देर में ट्रेन यहाँ से भी अपने अगले पड़ाव अराक्कोनम के लिए चली पड़ी। अराक्कोनम से करीब 5 किलोमीटर पहले मोसुर नामक स्टेशन में प्रवेश करते ही अपनी पूरे गति से चलती हुई ट्रेन बिलकुल एक झटके से रुक गई। सीट पर बैठे  यात्री इधर उधर लुढ़क गए। जो यात्री खड़े थे वो लोग भी एक दूसरे पर गिर पड़े और रही मेरी बात तो मैं तो ट्रेन के दरवाजे पर ही खड़े होकर आने वाले स्टेशन के फोटो लेने की कोशिश में था तो कुछ चोटें मुझे भी आई। पूरे कोच में चीख पुकार मची हुई हुई थी। जब सब कुछ शांत हुआ और स्थिति बेहतर हुई तो आरंभ हुआ रेलवे को भला-बुरा कहने का सिलसिला। ये वो समय था जब ट्रेन में सवार हर यात्री ट्रेन के ड्राइवर को अपने अपने ढंग से कोस रहा था, कोई कह रहा था कि साइकिल भी चलानी नहीं आती और ट्रेन चला रहा है, कोई कह रहा था लगता है रेलवे वाले पटरियों पर भी स्पीड ब्रेकर बनाने लगा है, किसी के शब्द थे कि शायद ट्रेन का इंजन खराब हो गया हो। हर यात्री अपने अपने राय दे रहे थे, पर हकीकत क्या थी इससे हर कोई अनजान था। 




इस ट्रेन में जितने लोग भी सवार थे सबको भगवान वेंकटेश्वर के दर्शन के लिए तिरुमला ही जाना था और अधिकतर लोग पहली बार ही आये थे। कुछ स्थानीय लोग भी थे पर हम भाषा की समस्या के कारण उनसे न तो कुछ पूछ सकते थे और न ही वो कुछ बता सकते थे। ट्रेन में सवार लोग सिग्नल नहीं होगा, इसे रोककर कोई और ट्रेन पास करेगी, आदि कहते हुए अपने अपने गुस्से को जाहिर कर रहे थे, पर वो गुंजाईश भी नहीं थी, क्योंकि पैसेंजर और एक्सप्रेस के लिए अलग अलग ट्रेक थे। ट्रेन "अब खुलेगी अब खुलेगी" के इंतज़ार में करीब 30 मिनट गुजर चुका था। अब लोगों का सब्र भी जवाब देने लगा था। मैं भी कंचन से बार बार और कंचन मुझसे बार बार एक ही सवाल कर रहे थे कि अगर रात हो गयी तो हम तिरुपति से तिरुमला कैसे पहुंचेंगे। अगर दिन रहते तिरुपति पहुंच जाते तो फिर तिरुमला आसानी से पहुंच जाते, और यदि रात हो गयी तो हम कहाँ जायेंगे कहाँ रुकेंगे। इसी तरह करते हुए करीब एक घंटा बीत गया। अब तक मेरा भी धैर्य जवाब दे चुका था। 

अब तक बहुत लोग अपने अपने सीट से उतरकर इंजन के पास जा रहे थे और जो भी व्यक्ति वहां जा रहा था वापस न आकर वहीं रुक रहा था। लोगों को जाता देख मेरा मन भी जाने का हुआ और मैं भी बेटे को इतना कहकर कि "मैं जरा देख कर आता हूँ और यदि ट्रेन खुल जाये तो घबराना नहीं क्योंकि मैं किसी न किसी बोगी में चढ़ जाऊंगा" चल दिया। मेरे बोगी और इंजन के बीच में 14 बोगी थे और इन 14 बोगियों को पार करता हुआ मैं इंजन के करीब पहुंच गया। वहां पहुंचकर भीड़ के बीच में ही किसी तरह घुसकर यहाँ क्या हुआ है ये देखने की कोशिश की और जो दिखा उसे देखकर एक पल के लिए तो मेरे आखों के आगे अँधेरा छा गया, ऐसी हालत में ऐसी चीज़ मैंने कभी देखी नहीं थी। वहां पर एक आदमी की शरीर क्षत-विक्षत अवस्था में पड़ा हुआ था जो ट्रेन के चपेट में आ गया था। उसके शरीर के कितने टुकड़े हुए होंगे ये तो भगवान् ही जाने। मुझसे ये सब देखा नहीं जाता और मैं भीड़ से निकल कर साइड में आ गया। जो आदमी या कोई भी जीव इस धरती पर जनम लेता है उसे एक न एक दिन तो जाना ही होता है, पर तरह से जाना मैंने पहली बार देखा। वो कौन था, कहाँ से आया कोई नहीं जानता था, उसने आत्महत्या की या गलती से ट्रेन की चपेट में आ गया इस बात की भी कोई जानकारी नहीं मिल सकी। एक दिन मरना तो सबको होता है पर भगवान ऐसी हालत में मौत किसी को न दे। 




मैंने जितना देखा उसके बाद मेरी हालत ऐसी थी कि मैं प्लेटफॉर्म पर दीवार के सहारे कुछ देर बैठा रहा और हालत ये हो गयी थी कि मैं आँख भी नहीं खोल पा रहा था, आंख बंद होते भी ही सब कुछ दिख रहा था। 20 मिनट बाद पत्नी ने फ़ोन किया तो उठा और एक बोतल पानी लेकर हाथ मुँह धोकर वापस अपने कोच की तरफ चल दिया। आने में जहां मुश्किल से करीब 3-4 मिनट लगे थे यहाँ से वापस अपनी सीट पर जाने में करीब 15 मिनट लग गए। वापस जाकर चुपचाप बिना कुछ बोले अपनी सीट पर बैठ गया। मुझे चुप और उदास बैठा देखकर पत्नी ने पता नहीं क्या समझा जो उसने मुझे पूछा कि किसी से झगड़ा कर लिए क्या? उसके बाद जब मैंने उसे सारी बातें बताई तो उल्टा मुझे ही सुनने को मिला कि आखिर आपको वहां जाने की क्या जरूरत पड़ी थी, आपके जाने न जाने से कोई फर्क तो पड़ना नहीं था, बस तो है नहीं कि ड्राइवर को चलने कह सकते हैं। उसके बाद सहानुभूति के शब्द भी सुनने को मिले कि कुछ देर आँखें बंद करके ॐ नमः शिवाय कीजिये, सब ठीक हो जायेगा, पर जो देखकर मैं आया था उसे देखने के बाद मेरा मन बिलकुल अशांत और उद्विग्न हो गया था। न जाने कितनी देर आँखें बंद किये बिल्कुल निःशब्द बैठा रहा। 

इस दौरान दूसरे स्टेशन से एक दूसरा इंजन मंगाया गया और इस ट्रेन के इंजन के बदले उस नए इंजन को लगाने के बाद आख़िरकार 5:15 बजे ट्रेन यहाँ से आगे के लिए प्रस्थान की और जल्दी ही अराक्कोनम स्टेशन पहुँच गई। अराक्कोनम से चलने के बाद तिरुतन्नी, एकंबरकुप्पन और पुत्तुर होते हुए ट्रेन 7:15 बजे रेनिगुंटा पहुँच गई। यहाँ फिर से इंजन बदला गया उसके बाद ट्रेन अपने अंतिम गंतव्य तिरुपति के लिए प्रस्थान की। रात हो चुकी थी और हम अब यही सोचने में लगे थे कि आज तो तिरुमला पहुंचना मुश्किल है। मेरे सीट के सामने वाली सीट पर एक महिला बैठी हुई थी, देखने में तो वो तेलुगु भाषी ही लग रही थी, और चेन्नई से ही वो भी आ रहीं थी। एक महिला दूसरी महिला से जल्दी घुलमिल जाती है इसलिए मैंने पत्नी से कहा कि उनसे पूछ कर देखो आगे के बारे में और यदि वो हिंदी जानती होगीं तो हमें कुछ मार्गदर्शन कर देंगे, नहीं तो किसी और से पूछेंगे। जब पत्नी ने उनसे तिरुपति से तिरुमला जाने के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि मेरे पापा यहीं रहते हैं और वो मुझे लेने के लिए स्टेशन पर आये हुए हैं, वो आप लोगों को सब बता देंगे और वैसे भी तिरुपति से तिरुमला जाने के लिए गाड़ियों की कोई दिक्कत नहीं है और वहां जाने के लिए 24 घंटे बस मिलती है। उनकी इतनी बात से ही मेरी चिंताएं दूर हो गई। 




करीब 8 बजे हम तिरुपति पहुंच गए। ट्रेन से उतरने के बाद उस महिला के पिता ने हमें अच्छी तरह समझा दिया और साथ ही ये भी हिदायत दे डाली कि चाहे कुछ देर बाद ही सही पर बस से जाना, जीप से बिल्कुल नहीं। और साथ ही ये भी कहा कि बस स्टेशन बस सामने ही है, ऑटो वाले बस स्टेशन के नाम से ऑटो में बैठाये भी तो पैदल ही चले जाना। वैसे तिरुपति से तिरुमला के लिए बसें दो जगह से मिलती है एक तो मुख्य बस स्टेशन है जो रेलवे स्टेशन से करीब एक किलोमीटर शिव निवासम के पास है और दूसरा बस रेलवे स्टेशन के सामने ही विष्णु निवासम के पास है। हम स्टेशन से बाहर निकले और ऑटो वाले के बात को अनुसना करते हुए बस स्टेशन आये और एक खाली बस में बैठ गए। खाली बस में बैठने के लिए भी हमें 4-5 बसों को छोड़ना पड़ा और साथ ही कड़ी मशक्कत भी करनी पड़ी। खैर जैसे भी हो बस में बैठने के बाद जैसे भी हो तिरुमला पहुंच ही जाएंगे। जल्दी ही बस चली और तिरुपति शहर से बाहर निकलने से थोड़ा पहले अलिपिरी नामक जगह पर एक बस डिपो के अंदर बस को रोककर टिकट कटवा लेने कहा गया। सब लोग काउंटर पर जाकर अपना अपना टिकट कटा कर बस में बैठ गए उसके बाद टिकट चेक किया गया फिर बस आगे चल पड़ी। यहाँ पर एक बार में ही आने और जाने का टिकट मिल जाता है, जिसकी वैधता 3 दिन की होती है और 3 दिन के अंदर आप किसी भी बस से कभी भी वापस आ सकते हैं। 

थोड़ा आगे चलने के बाद तिरुमला की पहाड़ियां आरंभ हो  जाती है और यहीं से सड़क दो भागों में बंट जाती है। एक सड़क यहाँ से ऊपर तिरुमला की ओर जाती है और दूसरी सड़क से नीचे तिरुमला से तिरुपति आती है। यहाँ से बस थोड़ी ही दूर एक चेकपोस्ट है जहाँ पर हरेक व्यक्ति और उसके सामान की चेकिंग होती है।जब हमारी बस भी चेकपोस्ट पर पहुँची तो सभी सवारियां बस से उतरकर अपने अपने सामान की चेकिंग करवाने लगे तब तक बस चेकपोस्ट के आगे जाकर खड़ी रही। सारी प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद हम फिर से बस में बैठ गए। एक एक करके बस के सभी लोग आ गए उसके बाद बस तिरुमला के लिए प्रस्थान कर गयी। बस जब तिरुमला की पहाड़ियों में ऊपर जा रही थी तो नीचे तिरुपति शहर को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे आसमान नीचे उतर आया हो और ठीक ऐसा ही नज़ारा वैष्णो देवी की चढ़ाई चढ़ते हुए कटरा शहर को देखने पर मिलता है। करीब 40 मिनट के सफर के बाद हम तिरुमला पहुंच गए। बस से उतरकर सबसे पहला काम CRO ऑफिस खोजना था। CRO ऑफिस में ही ऑनलाइन बुकिंग वालों को कमरे का अल्लोटेमेंट करते हैं। CRO ऑफिस खोजने में ही मुझे करीब 30 मिनट लग गए। वैसे ये रेल रिजर्वेशन ऑफिस के पीछे वाली बिल्डिंग में भूतल पर ही स्थित है। यहाँ जाने के बाद यहाँ जिस डॉक्यूमेंट से रूम बुक किया था वो चेक किया जाता है उसके बाद कमरा अलॉट किया जाता है। ऑनलाइन कमरा बुक करते समय आधार, पैन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, वोटर कार्ड, आदि जो भी डॉक्यूमेंट का नंबर आप बुकिंग के समय देते है वो आपको साथ में ले जाना जरूरी है अन्यथा आपकी बुकिंग कैंसिल मानी जाएगी। यहाँ मेरा भी डॉक्यूमेंट चेक किया गया उसके बाद मुझे कमरा अलॉट कर दिया जो वहीं 100 कदम दूर कल्याण कट्टा (जहाँ मुंडन होता है) के बगल में कल्याण चौल्ट्री नाम से है। कमरे में सामान रखने के बाद हम लोग फिर खाना खाने के लिए आये तब तक अन्नप्रसादम का समय ख़तम हो चुका था तो वहीं एक दुकान से 40 रुपए पार्टी प्लेट के  हिसाब से चावल और सब्जी लिया। जो चावल और सब्जी उन्होंने दिया वो अपने आप में मात्रा और स्वाद दोनों में परिपूर्ण था। चेन्नई में  खाना नहीं खा पाया था उसकी भरपाई यहाँ हो गई और यहाँ इतना सस्ता खाना मिलने एक सिर्फ एक ही कारण था कि यहाँ जगह जगह मंदिर समिति की तरह से यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं को मुफ्त में खाना खिलाया जाता है, जिसे अन्नप्रसादम कहा जाता है और यहाँ मिलने वाले पानी और लस्सी (मट्ठा) को जलप्रसादम कहा जाता है। 

खाना खा चुकने के बाद कमरे में आकर हम कल भगवान वेंकटेश्वर मंदिर के दर्शन को ध्यान में रखते हुए सो गए। इससे आगे का विवरण अगले पोस्ट में जो भगवान वेंकटेश्वर श्रीवारी मंदिर दर्शन के बारे में बताएँगे। तब आज्ञा दीजिये और बने रहिये मेरे साथ हम बस जल्दी ही लौटते हैं और साथ ही इसे पढ़ने लिए आपका धन्यवाद भी करते हैं।  



इस यात्रा के अन्य भाग भी अवश्य पढ़ें  




आइये अब इस यात्रा के कुछ फोटो देखते हैं :



चेन्नई और तिरुपति बीच कहीं सूर्यास्त
नीले रंग वाली सड़क ऊपर जाती है और सफ़ेद रंग वाली नीचे आती है 


अम्बट्टुर स्टेशन 

चेन्नई से तिरुपति जाते हुए चेन्नई में ही कहीं 

अण्णनुर स्टेशन 

आवडी स्टेशन 

पट्टाविराम स्टेशन 

नेमिलिचेरी स्टेशन 

पुतलूर स्टेशन 

तिरुवल्लुर स्टेशन 

एग्गाेट्टुर स्टेशन 

कदंबत्तूर स्टेशन 

चेन्नई और तिरुपति के बीच कहीं 

कुस्तलै नदी 

मगवूर स्टेशन 

तिरुवालंगाड स्टेशन 

चेन्नई और तिरुपति के बीच कहीं

पुलियामंगलम स्टेशन 

अरक्कोणम जंक्शन 

अरक्कोणम जंक्शन पर आदित्या 

तिरुत्तणि  स्टेशन 

चेन्नई और तिरुपति बीच कहीं सूर्यास्त से पहले 

चेन्नई और तिरुपति बीच कहीं सूर्यास्त से पहले 

चेन्नई और तिरुपति बीच कहीं सूर्यास्त से पहले 

चेन्नई और तिरुपति बीच कहीं सूर्यास्त से पहले 

चेन्नई और तिरुपति बीच कहीं 

चेन्नई और तिरुपति बीच कहीं 

चेन्नई और तिरुपति बीच कहीं 

चेन्नई और तिरुपति बीच कहीं 

चेन्नई और तिरुपति बीच कहीं 

चेन्नई और तिरुपति बीच कहीं 

चेन्नई और तिरुपति बीच कहीं 

चेन्नई और तिरुपति बीच कहीं पहाड़ पर बादलों का बसेरा 

वेपगुंता स्टेशन

पुत्तूर स्टेशन


इस यात्रा के अन्य भाग भी अवश्य पढ़ें  



18 comments:

  1. सभी फोटो नयनाभिराम है, पर इक आग्रह है, यूँ स्टेशनों की तस्वीर लेने के लिए कोच के गेट पर खड़े न रहे, यह खतरनाक ही नही कानूनन अपराध भी है। जैसा आपने कहा, किसी तेज झटके से गेट पर खड़े रहने कोई अप्रिय घटना की संभावना है।
    आप स्टेशनो के नाम नोट कर सकते है या जहाँ ट्रेन रूके तब फोटो ले सकते है। रास्ते की तस्वीर खिड़की से ली जा सकती है, तस्वीर के लिए खतरा उठाना ठीक नही है जी।
    हमको तो लगता है आप अधिकांश सफर खड़े रह कर ही तय कर लेते है।

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    1. अनुराग जी पहले तो धन्यवाद आपका, आपके आग्रह को मानते हुए आगे से कभी सफर करते हुए ट्रेन के दरवाजे पर खड़े नहीं होगें और यदि ट्रेन रुकी हो तभी फोटो खीचेंगे , और यदि संभव हुआ तो खिड़की से फोटो लेंगे अन्यथा कोई बात नहीं।

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  2. कई बार बहुत मजेदार मजेदार घटनाएं होती है खासकर ऐसे मौके पर जब किसी बीच स्टेशन पर बहुत देर खड़ी रहती है या धीरे धीरे चलती है जैसा कि आपने विवरण दिया बड़े मजेदार मजेदार वाक्य सुनने को मिलते हैं

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    1. हाँ तभी तो ट्रेन का सफर सबसे बढ़िया सफर कहा जाता है, जब हर कोई अपने अपने विचार दे रहे होते है तो सुनकर बहुत आनंद आता है,

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  3. फोटो खींचने के लिए कुछ पैसे खर्च कर देना ठीक लेकिन रिस्क लेना नहीं ठीक है।

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    1. आपकी बात बिलकुल शत प्रतिशत सही है कि फोटो के लिए रिस्क लेना सही नहीं है, और पैसे खर्च करके भी फोटो कहाँ से मिलेंगे

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  4. गज़ब के फोटो हैं और हर फोटो से जुडी ना जाने कितनी यादें हैं। आपकी ये यादें बहुत अनमोल हैं मगर हम सबके लिए आपकी ज़िन्दगी ज्यादा अनमोल है। आपकी घुमक्कड़ी बेमिसाल है मगर सुरक्षा भी जरूरी है।

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    1. धन्यवाद और अभिनंदन आपका, आप जैसे शुभचिंतक लोगों के होते हुए हम सकुशल ही रहेगें, हां सुरक्षा बहुत जरूरी चीज़ है,

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  5. सुंदर वर्णन

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    1. धन्यवाद और अभिनन्दन आपका

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  6. भाई जो ट्रेन रुकने पर आपने देखा वह वाकई हृदयविदारक लगा बाकी भगवन वेंकटेश सब ठीक करेंगे

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    1. पूरे सफर में भगवान वेंकटेश की कृपा से सब बढ़िया रहा सिवाय इस दृश्य को देखने के

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  7. सुन्दर तसवीरें। जब मैं मुंबई में रहा करता था तो अक्सर ट्रेन से होते एक्सीडेंट देखने को मिल जाते थे। इस यात्रा की शुरुआत में ही आपके साथ ऐसा हुआ उसके लिए दुःख है। हाँ, गेट में खड़े होकर तसवीरें नहीं खींचा करिए। तस्वीरों के लिए जान जोखिम में डालने की जरूरत नहीं। अगली कड़ी का इन्तजार है।

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    1. विकाश जी धन्यवाद आपका, मैंने अपने जीवन पहली रेल दुर्घटना देखा था वो ये मेरे लिए असहनीय था, अब तक ख़बरों में देखता था पर सब कुछ जब अपनी आखों से सामने देखा तो मेरी हिम्मत जवाब दे गयी थी। हाँ अब आगे ट्रेन के दरवाजे पर खड़े होकर कभी फोटो नहीं लेंगे और अगला भाग जल्दी ही आपके सामने होगा

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  8. जानकारी से परिपूर्ण यात्रा..अब अगले भाग का इंतजार है सिन्हा साहब..

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    1. धन्यवाद गौरव जी अगला भाग जल्दी ही आपके समक्ष होगा

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  9. पहली बार तिरुपति के बारे में कोई पोस्ट पढ़ रहा हूँ... आपने भरपूर जानकारी का समावेश किया है |

    ट्रेन से दुर्घटना वाली बात पढ़कर मैं भी सिहर गया ..... |

    सलाह : जो अभी ने दी है .... हमेशा ट्रेन के गेट पर खड़े होकर यात्रा न कीजिये... फोटो जरूरी आपकी सेहत है जिससे और लोग भी जुड़े हुए है


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    1. रितेश भाई जी पोस्ट पढ़ने के लिए धन्यवाद और अभिनंदन आपका , कुछ कमी हो उसके लिए मार्गदर्शन मार्गदर्शन करते रहें। हाँ भाई जी उस दुर्घटना को मैंने देखा था , आज भी डर लगता है।
      अब हमेशा क्या कभी भी गेट पर खड़े होकर यात्रा नहीं करेंगे, चाहे फोटो आये या न आये

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