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Saturday, November 4, 2017

तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा (भाग 7) : चंद्रशिला का अधूरा सफर

तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा (भाग 7) : चंद्रशिला का अधूरा सफर




तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा के इस भाग में आइए हम आपको एक ऐसे सफर पर ले चलते हैं जिसमें न तो कोई मंजिल न ही कोई पड़ाव है, अगर कुछ है तो वो है अनजान, खतरनाक और डरावने रास्ते। जहां कोई अपनी मर्जी से जाना नहीं चाहता, बस कोई भटकाव ही किसी इंसान को उस रास्ते पर ले जा सकता है और ऐसा ही कुछ हम लोगों के साथ हुआ। अब तक आपने देखा कि मौसम कि इतनी दुश्वारियां और परेशानियां झेलते हुए हम तुंगनाथ मंदिर तक पहुंचे। मंदिर के पास पहुंचते ही पता चला कि आज ग्रहण है इसलिए अब मंदिर बंद हो चुका है जो कल सुबह 5ः30 बजे खुलेगा। हम लोगों के लिए यह भी एक मुसीबत के जैसा ही था कि तीन दिन का सफर करके हम लोग यहां तक आए और जिस चीज के लिए आए वही चीज न मिल पाया। थक-हार हमने यहीं रुकने का प्लान बनाया। अब यहां बैठ कर समय बर्बाद करने से अच्छा हमने चंद्रशिला जाने की योजना बनाई। चंद्रशिला समुद्र तल से लगभग 4000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। तुंगनाथ जी का मंदिर लगभग 3600 मीटर की ऊंचाई पर है और चंद्रशिला करीब 4000 मीटर की ऊंचाई पर है और दोनों स्थानों के बीच की दूरी करीब 1.5 किलोमीटर है। अब इन आंकड़ों पर गौर करें तो चढ़ाई बहुत मुश्किल है। वैसे भी तुंगनाथ से चंद्रशिला जाने का कोई रास्ता नहीं बना है, बस कुछ जुनूनी लोगों के आने-जाने से कुछ निशान बन गए हैं और वही रास्ता है। बरसात के कारण वो रास्ते भी न जाने कितने फिसलन भरे हुए हो गए होंगे इसका पता तो वहां जाकर ही लगेगा। जाने से पहले भी बहुत सोच विचार करना पड़ रहा था कि अगर किसी कारण से फिसलन भरे रास्तों पर गिर गए और भीग गए तो हमारे पास पहनने के लिए अलग से कोई कपड़े नहीं हैं क्योंकि हमारा सारा सामान नीचे चोपता में ही था। हम लोगों ने जो कपड़े पहन रखा था उसके अलावा हम लोगों के पास तौलिया के अलावा और कुछ नहीं था, फिर भी हम सबने एक मत से चंद्रशिला जाने के लिए तैयार हो गए। अचानक ही धीरज और सुप्रिया जी ने जाने से मना कर दिया तो हम मैं, बीरेंद्र भाई जी, सीमा जी और राकेश जी ही चंद्रशिला की तरफ रवाना हुए।

Friday, November 3, 2017

तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा (भाग 6) : तुंगनाथ जी मंदिर

तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा (भाग 6) : तुंगनाथ जी मंदिर





तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा के इस भाग में हम आपको तुंगनाथ मंदिर ले चलते हैं। तुंगनाथ का स्थान पंच केदारों में से तीसरे स्थान पर है। पहले स्थान पर केदारनाथ मंदिर जो द्वादश ज्योतिर्लिगों मे से एक है। द्वितीय केदार के रूप में भगवान मदमहेश्वर की पूजा की जाती है। तुंगनाथ मंदिर तृतीय केदार के नाम से जाना जाता है। चतुर्थ और पंचम केदार क्रमशः रुद्रनाथ और कल्पेवश्वर को माना जाता है। तुंगनाथ जी का मंदिर समुद्र तल से लगभग 3680 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। मंदिर कई पौराणिक तथ्यों को अपने आप में समेटे हुए है। कथाओं के आधार पर यह माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण पांडवों ने किया था। मंदिर का इतिहास हजारों साल पूर्व का रहा है। यहीं मंदिर से कुछ ऊपर एक चंद्रशिला नामक चोटी है जिसके बारे में कहा जाता है कि राम ने रावण का वध करने के पश्चात ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त होने के लिए कुछ दिन तक इस चोटी पर तपस्या की थी और तभी से इस स्थान का नाम चंद्रशिला पड़ गया। यह मंदिर केदारनाथ और बदरीनाथ मंदिर के लगभग बीच में स्थित है। यह गढ़वाल के सुंदर स्थानों में से एक है। जनवरी से मार्च तक मंदिर पूरी तरह से बर्फ में डूबा हुआ होता है। बरसात के मौसम में दूर दूर तक हरियाली ही हरियाली दिखती है। तुंगनाथ तक पहुंचने के लिए चोपता से तुंगनाथ तक की तीन किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई का रास्ता पैदल ही तय करना पड़ता है। चोपता से तुंगनाथ के पैदल मार्ग को हर जगह 3 किलोमीटर ही लिखा गया है पर मुझे ये दूरी 3 किलोमीटर से ज्यादा प्रतीत होती है। अब चाहे दूरी जितनी हो जिनको जाना है वो चाहे कितनी भी दूरी वो तो जाएंगे ही।

Thursday, November 2, 2017

तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा (भाग 5) : गुप्तकाशी से चोपता

तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा (भाग 5) : गुप्तकाशी से चोपता




तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा के इस भाग में आईए हम आपको ले अपने साथ चोपता तक लेकर चलेंगे। चोपता का नाम सुनते ही कुछ अजीब सा लगता है कि कैसा नाम है चोपता। चोपता नाम बेशक कुछ बेढब सा है, मगर यह उत्तराखंड में गढ़वाल हिमालय की सबसे खूबसूरत जगह है। यहां पहुंचकर आप प्रकृति से सीधा साक्षात्कार कर सकते हैं। चोपता समुद्र तल से करीब 12 हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित है और इससे थोड़ी ज्यादा ऊंचाई तक का क्षेत्र हम सबकी पहुंच में होता है। यहां आपने के लिए सबसे उपयुक्त समय मई से लेकर नवंबर तक है लेकिन बरसात में यहां आना थोड़ी परेशानी खड़ी करता है। दिसंसबर से अप्रैल तक यहां की ठंड बिल्कुल ही असहनीय होती है। यहां बहने वाली हवाएं बहुत ही ठंडी होती है। यहां आस-पास चारों तरफ फैली हरियाली के बीच पल-पल बारिश से सामना और बदन पर बादलों की मखमली छुअन का आनंद ही कुछ और है। तुंगनाथ जाने के लिए चोपता आधार शिविर हैं। चोपता तक आप सड़क मार्ग से आ सकते हैं और चोपता से आगे का सफर पैदल चढ़ाई या घोड़े से पूरी होती है। भले ही ही यहां खाना-पीना थोड़ा महंगा मिलता है पर खाने-पीने की कोई दिक्कत नहीं है। यहां दूर दूर तक फैले घास के मैदान जिसे स्थानीय भाषा में बुग्याल कहते है, आपको एक अलग ही दुनिया की सैर कराती नजर आएंगी। वैसे अगर हम अपने अनुसार कहें तो चोपता के तारीफ जितनी की जाये उतनी कम है। कुछ लोगा तो चोपता की तुलना स्वीटजरलैंड से करते हैं। प्रकृति की ने भी इस जगह को दिल खोलकर सजाया-संवारा है। आज भी यह स्थान शहरों की भागा-दौड़ी से बहुम दूर है। भीड़भाड़ के नाम पर यहां केवल कुछ ढाबे और कुछ दो कमरे वाले होटल हैं, जिसमें यहां आने वाले यात्री विश्राम कर सकते हैं और साथ ही जो भी गेस्टहाउस या ढाबे यहां पर बने हैं सब लकड़ी के ही बने मिलते हैं।

Wednesday, November 1, 2017

तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा (भाग 4) : कालीपीठ, उखीमठ

तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा (भाग 4) : कालीपीठ, उखीमठ



तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा के इस भाग में आईए हम आपको ले चलते हैं उस स्थान पर जिसका संबंध शिव और शक्ति दोनों से है और उस पवित्र स्थान का नाम है कालीमठ। कालीमठ रुद्रप्रयाग (उत्तराखंड) जिले का एक प्रमुख धार्मिक स्थल है। यह गुप्तकाशी और उखीमठ के बीच सरस्वती नदी के किनारे पर स्थित है। इसे भारत के सिद्ध पीठों में एक माना जाता है। कालीमठ में देवी काली का एक बहुत ही प्राचीन मंदिर है। कहा जाता है कि मां भगवती ने इस स्थान पर दैत्यों के संहार के लिए काली का रूप धारण किया था और उसी समय से इस स्थान पर भगवती के काली रूप की पूजा-अर्चना होती आ रही है। यहां देवी काली ने दुर्दान्त दैत्य रक्तबीज का संहार किया था, उसके बाद देवी इसी जगह पर अंतर्धान हो गई। कहा यह भी जाता है कि यही जगह प्रसिद्ध कवि कालीदास का साधना-स्थली भी थी। इसी जगह पर कालीदास ने मां काली को प्रसन्न करके विद्वता प्रदान की थी। यह स्थान धार्मिक दृष्टिकोण से तो महत्वपूर्ण है साथ यहां प्रकृति का भी अलौकिक सौंदर्य बिखरा पड़ा है। साल 2013 में आई केदारनाथ त्रासदी के दौरान कालीमठ में स्थित मां लक्ष्मी, शिव मंदिर, ब्रती बाबा समाधि स्थल, मंदिर समिति कार्यालय समेत स्थानीय लोगों के कई व्यापारिक प्रतिष्ठान आपदा की भेंट चढ़ गये थे। महालक्ष्मी मंदिर के टूटने के साथ ही मंदिर में रखी हुई पौराणिक पत्थर तथा धातु की मूर्तियों में से कई मूर्तियां सरस्वती नदी के उफान में बह गई। सरस्वती नदी के दीवार के साथ बनी रेलिंग पर भक्तों द्वारा बांधी गई घंटियां इसकी शोभा में चार चांद लगाने का काम करती है।

Monday, October 30, 2017

तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा (भाग 3) : काशी विश्वनाथ मंदिर, गुप्तकाशी

तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा (भाग 3) : काशी विश्वनाथ मंदिर, गुप्तकाशी



तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा के इस भाग में आईए हम आपको ले चलते हैं गुप्तकाशी में स्थित भगवान भोलेनाथ के प्रसिद्ध और पुरातन मंदिर में जिसका संबंध महाभारत काल से ही है। गुप्तकाशी कस्बा केदारनाथ यात्रा का मुख्य पड़ाव है। कहा जाता है कि पहले इसका नाम मण्डी था। जब पांडव भगवान् शंकर के दर्शन हेतु जा रहे थे तब इस स्थान पर शंकर भगवान् ने गुप्तवास किया था जिसके बाद पांडवों ने यहां काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण किया था। इस कारण इस स्थान का नाम गुप्तकाशी पड़ा। काशी विश्वनाथ के मंदिर में एक मणिकर्णिका नामक कुंड है जिसमे गंगा और यमुना नामक दो जलधाराएं बहती है। हमने भी अपनी तुंगनाथ यात्रा के दौरान इस मंदिर में महादेव के दर्शन किया तो आइए आप भी हमारे साथ इस मंदिर में भगवान भोलेनाथ के दर्शन करिए। कहा जाता है न कि जो होता है अच्छे के लिए होता है। अगर कल शाम को बरसात न हुई होती तो शायद हम गुप्तकाशी न आकर उखीमठ ही चले जाते और उखीमठ जाते तो ये यात्रा केवल तुंगनाथ तक ही सीमित रह जाती और हम गुप्तकाशी में स्थित भगवान भोलेनाथ के दर्शन के से वंचित रह जाते वो भी श्रावण महीने के पूर्णिमा के दिन। मेरे सबसे पहले जागने और नहा-धो कर तैयार होने का मुझे एक फायदा यह मिला कि जब तक हमारे सभी साथी स्नान-ध्यान में लगे तब तक हम पहाड़ों की खूबसरती का दीदार करने के लिए गेस्ट हाउस की छत पर चला गया। यहां जाकर जो पहाड़ों में बरसात का जो नजारा दिखा वो कभी न भूलने वाले पलों में शामिल हो गया। बहुत लोगों को कहते सुना है कि बरसात में पहाड़ों की घुमक्कड़ी करने से बचना चाहिए और ये बात बहुत हद तक सही भी है। पर इस बरसात में यहां आकर हमने पहाड़ों का जो सौंदर्य देखा उसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता। जिस तरह शादी में नई दुल्हन सजी संवरी होती है ठीक वैसे ही पहाड़ भी इस मौसम में एक दुल्हन की तरह दिख रही थी। बरसात के कारण मुरझाए पेड़ों पर हरियाली छाई हुई थी। पिछले साल जब जून के महीने में हम यहां आए तो यही पहाड़ सूना-सूना लग रहा था पर बरसात में इन पहाड़ों का मुझे एक अलग ही रूप देखने को मिला। एक तो हरा-भरा पहाड़ उसके ऊपर से अठखेलियां करते बादल का आना और जाना मन को मुग्ध कर रहा था।

Friday, October 27, 2017

तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा (भाग-2) : हरिद्वार से गुप्तकाशी

तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा (भाग-2) : हरिद्वार से गुप्तकाशी



तुंगनाथ चंद्रशिला यात्रा के दूसरे भाग में आइए आपको ले चलते हैं हरिद्वार से गुप्तकाशी। हरिद्वार में सब कुछ करते करते नौ बज चुके थे। करीब साढ़े नौ बजे हम धर्मशाला से निकलकर बस स्टेशन की तरफ चल पड़े। बस स्टेशन धर्मशाला से केवल 5 मिनट की दूरी पर था तो हम सब जल्दी ही वहां पहुंच गए। बस स्टेशन के पास बाहर ही कुछ प्राइवेट बसें खड़ी थी जिसमें से एक बस गोपेश्वर जा रही थी। बस बिल्कुल ही खाली थी। हम सभी लोग उसी बस में बैठ गए कि रुद्रप्रयाग में उतर फिर वहां से उखीमठ की बस में बैठ जाएंगे, पर होनी को तो कुछ और मंजूर था। बस में बैठने के बाद बीरेंद्र भाई ने कहा कि इस बस के पीछे एक बस है जो सीधे उखीमठ जा रही है। हमने थोड़ा तांक-झांक कर देखा तो ये मालूम पड़ गया कि उस बस में हम सभी के लिए अच्छी सीट मिलने वाली नहीं है इसलिए हमने इसी बस से रुद्रप्रयाग तक जाना उचित समझा और रुद्रप्रयाग पहुंचकर वहां से किसी दूसरे बस या मैक्स वाहन से उखीमठ तक का सफर तय कर लेंगे। बस ठीक साढ़े दस बजे हरिद्वार से चल पड़ी और कुछ ही देर में भीड़ भरे बाजार से होते हुए हरिद्वार-ऋषिकेश बाईपास पर आ गई। मौसम में गर्मी के साथ उमस भरी हुई थी पर बस के चलने से बस के अंदर हवा का संचार हुआ तो गर्मी और उमस से थोड़ी राहत मिलनी आरंभ हो गई। कुछ ही देर में बस चिल्ला वन्यजीव अभ्यारण रेंज में प्रवेश कर गई। चिल्ला वन्यजीव अभ्यारण्य वर्ष 1977 में बनाया गया था। यह 249 वर्ग किमी के क्षेत्र में फैला हुआ है। यह हरिद्वार से 10 किमी दूर गंगा नदी के किनारे स्थित है। वर्ष 1983 में इसे मोतीचूर एवं राजाजी अभ्यारण्यों के साथ मिलाकर राजाजी राष्ट्रीय उद्यान बनाया गया। चिल्ला वन्यजीव अभ्यारण्य में कई प्राणी है जैसे कि चीते, हाथी, भालू और छोटी बिल्लियाँ आदि। यहां से गुजरने पर कई तरह के सुंदर पक्षियों, तितलियों को देखने का सौभाग्य प्राप्त होता है। वैसे इस अभ्यारण्य में भ्रमण करने के लिए नवंबर से जून के बीच का समय सबसे अच्छा माना जाता है। हरिद्वार से ऋषिकेश और ऋषिकेश से हरिद्वार आने जाने वाली अधिकतर गाडि़यों दिन के समय इसी रास्ते से आती जाती है, पर रात में यहां से किसी भी प्रकार की गाडि़यों का गुजरना प्रतिबंधित है।

Wednesday, June 21, 2017

केदारनाथ से वापसी

केदारनाथ से वापसी 

पाँचवाँ दिन

कल जिस उमंग और उत्साह से गौरीकुंड से केदारनाथ आये थे आज उसके विपरीत उदास और भारी मन से केदारनाथ से वापसी  की राह पकड़नी थी। यहाँ से जाने का मन तो नहीं हो रहा था पर वापस तो जाना ही था। आज हमारी यात्रा केदारनाथ से गौरीकुंड तक पैदल मार्ग और उसके आगे गौरीकुंड से गौचर तक बस यात्रा की थी। 

4 दिन तक जो 3 बजे ही जागने की आदत हो गयी थी उसके वजह से आज हम बिना अलार्म बजे ही 3 बजे जग गए। सारा सामान पैक किया और सारी तैयारी करते करते 4 :30 हो गए थे। अब हम निकलने की सोच ही रहे थे कि एक आदमी चाय की बड़ी से केतली लेकर आया जो हरेक हट जिसमें लाइट जल रही थी उसमें चाय दे रहा था। उसने हम लोगों को भी चाय दी। उसके चाय की कीमत जो थी बहुत ही आश्चर्यजनक थी। एक कप चाय केवल 10 रुपए। इतनी ऊँचाई पर 10 रुपए में चाय बहुत कम लग रही थी। यहाँ तो उसकी कीमत 20 रुपए भी होती तो कम होती। उसके बाद मैंने उससे पूछा कि जाने से पहले किसे बताना होगा तब उसने कहा कि किसी को बताने की जरुरत नहीं है आप अपना सामान लेकर जा सकते हैं। उसके बाद वो दूसरे को चाय देने चला गया।

Thursday, April 13, 2017

दिल्ली से हरिद्वार और श्रीनगर (Delhi to Haridwar and Srinagar)

दिल्ली से हरिद्वार और श्रीनगर
(Delhi to Haridwar and Srinagar)

पहला दिन 

यात्रा की सारी तैयारी हमलोगों ने पहले ही कर ली थी। 3 जून को मम्मी पापा का पटना से टिकट था और 4 जून को सुबह वो लोग दिल्ली पहुँच गए। उनकी ट्रेन आने से पहले ही मैं रेलवे स्टेशन पहुंच गया।  ट्रेन समय से आ गई। उनलोगों को लाने के बाद मैं अपने ऑफिस के लिए निकल गया। ऑफिस से 4 बजे ही निकल गया। घर आकर सारी तैयारीयों का जायजा लिया और फिर यात्रा की तैयारी में व्यस्त हो गया। हमारी हरिद्वार की ट्रेन पुरानी दिल्ली स्टेशन से रात्रि में 10:10 पर थी। सबका विचार था की घर से खाना खाकर 9 बजे निकला जाये। 9 बजे निकलने पर या तो मेट्रो या बस से से जाना पड़ता उसमें भी एक जगह बदलना पड़ता और 7 बजे वाली पैसेंजर ट्रेन से चले जाने पर न तो कही बदलने की समस्या न ही भीड़ में धक्का मुक्की। अंत में यही तय हुआ कि 7 बजे ही निकला जाये और स्टेशन पर ही खाना खाया जाये।  

Wednesday, March 22, 2017

बदरीनाथ : एक अदभुत अहसास

बदरीनाथ : एक अदभुत अहसास


वैसे तो पूरा उत्तराखंड ही देव भूमि कहा जाता है। उत्तराखंड का हिन्दू संस्कृति और धर्म में महत्वपूर्ण स्थान है। यहां गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ जैसे कई सिद्ध तीर्थ स्थल हैं। पूरे देश में में भगवान विष्णु के हज़ारों मंदिर हैं परन्तु उत्तराखंड स्थित पंच बदरी सर्वोपरि हैं। बदरीनाथ को चारधामों में से एक माना जाता है। मुझे भी इस धाम पर जाने और वहाँ एक दिन बिताने का सौभग्य मिला। 

समुद्र  के तल से लगभग 3133 मीटर की ऊंचाई पर बदरीनाथ धाम स्थित है। माना जाता है कि शंकराचार्य ने आठवीं शताब्दी में इसका निर्माण कराया था। वर्तमान में शंकराचार्य की निर्धारित परंपरा के अनुसार उन्हीं के वंशज नंबूदरीपाद ब्राह्मण भगवान बदरीविशाल की पूजा-अर्चना करते हैं। बदरीनाथ की मूर्ति शालग्रामशिला से बनी हुई, चतुर्भुज ध्यान मुद्रा में है। कहा जाता है कि यह मूर्ति देवताओं ने नारदकुण्ड से निकालकर स्थापित की थी। सिद्ध, ऋषि, मुनि इसके प्रधान अर्चक थे। जब बौद्धों का प्राबल्य हुआ, तब उन्होंने इसे बुद्ध की मूर्ति मानकर पूजा आरम्भ की। शंकराचार्य की प्रचार यात्रा के समय बौद्ध तिब्बत भागते हुए मूर्ति को अलकनन्दा में फेंक गए। शंकराचार्य ने अलकनन्दा से पुन: बाहर निकालकर उसकी स्थापना की। तदनन्तर मूर्ति पुन: स्थानान्तरित हो गयी और तीसरी बार तप्त कुण्ड से निकालकर रामानुजाचार्य ने इसकी स्थापना की।

Monday, January 9, 2017

केदारनाथ कैसे जाएँ (How to reach Kedarnath)

 केदारनाथ : अद्भुत, अविश्सनीय, अकल्पनीय 

वैसे तो पूरा उत्तराखंड ही देव भूमि कहा जाता है। उत्तराखंड का हिन्दू संस्कृति और धर्म में महत्वपूर्ण स्थान है। यहां गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ जैसे कई सिद्ध तीर्थ स्थल हैं। सारी दुनिया में भगवान शिव के करोड़ों मंदिर हैं परन्तु उत्तराखंड स्थित पंच केदार सर्वोपरि हैं। भगवान शिव ने अपने महिषरूप अवतार में पांच अंग, पांच अलग-अलग स्थानों पर स्थापित किए थे। जिन्हें मुख्य केदारनाथ पीठ के अतिरिक्त चार और पीठों सहित पंच केदार कहा जाता है। इस लेख में अभी हम केवल केदारनाथ और पंच केदार की बात करेंगे।  बाकी जगहों की बातें बाद में दूसरे लेख में करेंगे। इस लेख में दिए गए सारे फोटो मेरे द्वारा लिए गए हैं जब मैं केदारनाथ की यात्रा पर गया था।  जो फोटो मेरी नहीं है मैंने उसके आगे लिख दिया है कि फोटो कहाँ से लिया गया है। 

Tuesday, January 3, 2017

केदारनाथ (Kedarnath)

केदारनाथ (Kedarnath)

चौथा दिन

सुबह के 3 बजते ही मोबाइल का अलार्म बजना शुरू हो गया। नींद पूरी हुई नहीं थी इसलिए उठने का मन बिलकुल नहीं हो रहा था।  सब लोगों को जगाकर मैं एक बार फिर से सोने की असफल कोशिश करने लगा।जून के महीने में भी ठण्ड इतनी ज्यादा थी कि रजाई से बाहर निकलने का मन नहीं हो रहा था। 5 बजे तक हम लोगों को तैयार होकर गेस्ट हाउस से केदारनाथ के लिए निकल जाना था इसलिए ना चाहते हुए भी इतनी ठण्ड में रजाई से निकलना ही था। पहले तो पिताजी और बेटे नहाने गए। उसके बाद माताजी और पत्नी की बारी आयी। मेरा मन गरम पानी के झरने में नहाने का करने लगा पर हिम्मत नहीं हो रही थी कि बाहर निकलें। कमरे के अंदर का तापमान जब 5 डिग्री के करीब था तो सोचिये बाहर का तापमान कितना होगा। फिर मैं टॉर्च और एक टॉवेल लिया और पिताजी को ये बोलकर कि मैं कुछ देर में आता हूँ और तेज़ी से कमरे से निकल गया। बाहर निकलते ही ठण्ड ने अपना असर दिखाया। ऐसा लग रहा था कि मैं किसी बर्फ से भरे  किसी टब में हूँ। मैं दौड़ता हुआ गेस्ट हाउस की 50 सीढियाँ उतर गया। हर तरफ सन्नाटा पसरा हुआ था। उस सन्नाटे में मन्दाकिनी नदी की पानी के बहने की जो आवाज़ थी बहुत ही मधुर लग रही थी। मन्दाकिनी की आवाज ऐसे लग रही थी जैसे कोई संगीत की धुन हो। मैं सीढ़ियों से उतरने के बाद मन्दाकिनी की तरफ गया और देखने लगा की गरम पानी का झरना किधर है।

श्रीनगर (गढ़वाल) से गौरीकुण्ड (Srinagar to Gaurikund)

श्रीनगर (गढ़वाल) से गौरीकुण्ड (Srinagar to Gaurikund)

तीसरा दिन
आज हमें श्रीनगर से रुदप्रयाग हुए होते हुए गौरीकुंड तक जाना था और गौरीकुंड में ही रात्रि विश्राम करना था।सुबह हम लोग 3 बजे ही जाग गए। कल की थकान के कारण आज उठने का मन नहीं कर रहा था फिर भी किसी तरह उठा और नहाने गए तो पानी बहुत ठंडा था फिर भी हम लोग नहाये सामान पैक किया और 5 बजे गेस्ट हाउस से बाहर आ गए। बाहर आते ही एक जीप मिली वो रुद्रप्रयाग तक जा रही थी हम लोग उसमें बैठ गए। 6 बजे हम लोग रुद्रप्रयाग पहुँच गए।  जीप वाले ने हमसे 5 लोगों के 150 रुपए लिया। मौसम बिलकुल ठंडा था।  कहाँ दिल्ली में 40 से 40 डिग्री तापमान और यहाँ इतनी ठण्ड। रुद्रप्रयाग पहुँचते पहुँचते बेटा ठण्ड से काँपने लगा था। यहाँ जीप से उतरते ही सबसे पहले उसे जैकेट पहनाया गया। रुद्रप्रयाग में जहाँ हम जीप से उतरे वहां पर बहुत साड़ी जीपें खड़ी थी। कुछ जीप गुप्तकाशी जा रही थी, कुछ कर्णप्रयाग, कुछ चमोली, कुछ उखीमठ। यहाँ से कोई भी जीप सीधे सोनप्रयाग तक नहीं जा रही थी, जो भी जा रही थी गुप्तकाशी तक और गुप्तकाशी से फिर दूसरी जीप से सोनप्रयाग।  मैं गुप्तकाशी जाने वाली एक जीप में बैठने ही वाला था कि एक बस पर नज़र पड़ी जो सीधे सोनप्रयाग जा रही थी। हम बस में जाकर बैठ गए। 7 बजे बस खुली और रुद्रप्रयाग बाजार पर करने के बाद मैंने देखा की वह से सड़क दो तरफ जाती है। एक सड़क बदरीनाथ और दूसरी केदारनाथ। रुद्रप्रयाग में अलकनन्दा और मन्दाकिनी का संगम है। मन्दाकिनी केदारनाथ से आती है और अलकनन्दा बदरीनाथ से आती है। यहाँ दोनों मिलकर इससे आगे देवपरयाग तक अलकनन्दा के नाम से ही जानी जाती है।रुद्रप्रयाग बाजार पार करने के बाद बस केदारनाथ के रास्ते पर चल पड़ी। रुद्रप्रयाग से सोनप्रयाग तक का बस का एक आदमी का किराया 100 रुपए है। सड़क इतनी खतरनाक  कि देखकर ही जान निकल जाती।  सड़क पर बस दौड़ी चली जा रही थी।

Saturday, December 31, 2016

केदारनाथ के खूबसूरत दृश्य

केदारनाथ के खूबसूरत दृश्य


प्रकृति के खूबसूरत नज़ारे 

केदारनाथ में प्रकृति के खूबसूरत दृश्य भी बहुत हैं।  जो तस्वीरें मैं यहाँ दे रहा हूँ ये तो कुछ भी नहीं है, वहां और भी ऐसे सुहाने दृश्यों की कोई कमी नहीं है।  इन दृश्यों को देखकर आप यहाँ से आना नहीं चाहेंगे, बस इनको देखते रहने का मन करेगा। कल कल करती बहती मन्दाकिनी, बर्फ से ढँके पहाड़, हरे भरे पेड़ पौधे, पहाड़ से गिरते झरने।  जो कुछ मैं अपने कैमरे में कैद कर सका उसे यहाँ दे रहा हूँ।

माणा : भारत का आखिरी गांव (Maana: Last Village of India)

बदरीनाथ से माणा गांव 


माणा गांव एक नजर में 

बदरीनाथ से तीन किमी आगे भारत का आखिरी गांव माणा सांस्कृतिक विरासत और अपनी अनूठी परंपराओं के लिए खासा महत्वपूर्ण है। लेकिन इससे भी ज्यादा यहां की प्राकृतिक सुंदरता देश विदेश के पर्यटकों के अपनी ओर खींचती है। मांणा गांव समुद्र तल से 10,200 फुट की ऊंचाई पर बसा है। भारत-तिब्बत सीमा से लगे यह गांव अपनी अनूठी परम्पराओं के लिए भी खासा मशहूर है। यहां रडंपा जनजाति के लोग निवास करते हैं। पहले बद्रीनाथ से कुछ ही दूर गुप्त गंगा और अलकनंदा के संगम पर स्थित इस गांव के बारे में लोग बहुत कम जानते थे लेकिन अब सरकार ने यहां तक पक्की सड़क बना दी है। इससे यहां पर्यटक आसानी से आ जा सकते हैं, और इनकी संख्या भी पहले की तुलना में अब काफी बढ़ गई है। भारत की उत्तरी सीमा पर स्थित इस गांव के आसपास कई दर्शनीय स्थल हैं जिनमें व्यास गुफा, गणेश गुफा, सरस्वती मन्दिर, भीम पुल, वसुधारा आदि मुख्य हैं। मांणा में कड़ाके की सर्दी पड़ती है। छह महीने तक यह क्षेत्र केवल बर्फ से ही ढका रहता है। यही कारण है कि यहां कि पर्वत चोटियां बिल्कुल खड़ी और खुष्क हैं। सर्दियां शुरु होने से पहले यहां रहने वाले ग्रामीण नीचे स्थित चमोली जिले के गांवों में अपना बसेरा करते हैं। शायद ही कोई ऐसा पर्यटक होगा जो बद्रीनाथ धाम से 3 किलोमीटर आगे इस दुकान पर लगे ‘भारत की आखिरी चाय की दुकान’ के बोर्ड के सामने फोटो न खिंचवाता हो. इस बोर्ड पर अंग्रेजी और हिन्दी सहित 10 भारतीय भाषाओं में लिखा है ‘भारत की आखिरी चाय की दुकान में आपका हार्दिक स्वागत है'.

बदरीनाथ (Badrinath)

बदरीनाथ (Badrinath)

बदरीनाथ  के बारे में 
बदरीनाथ भारत के उत्तरी भाग में स्थित एक स्थान है जो हिन्दुओं का प्रसिद्ध तीर्थ है। यह उत्तराखण्ड के चमोली जिले में स्थित एक नगर पंचायत है। यहाँ बद्रीरीनाथ मन्दिर है जो हिन्दुओं के चार प्रसिद्ध धामों में से एक है। बदरीनाथ जाने के लिए तीन ओर से रास्ता है रानीखेत से, कोटद्वार होकर पौड़ी (गढ़वाल) से ओर हरिद्वार होकर देवप्रयाग से। ये तीनों रास्ते रूद्वप्रयाग में मिल जाते है। रूद्रप्रयाग में मन्दाकिनी और अलकनन्दा का संगम है। जहां दो नदियां मिलती है, उस जगह को प्रयाग कहते है। बदरी-केदार की राह में कई प्रयाग आते है। रूद्रप्रयाग से जो लोग केदारनाथ जाना चाहतें है, वे उधर चले जाते है। भारत के प्रसिद्ध चार धामों में द्वारिका, जगन्नाथपुरी, रामेश्वर व बदरीनाथ आते है. इन चार धामों का वर्णन वेदों व पुराणौं तक में मिलता है. चार धामों के दर्शन का सौभाग्य पूर्व जन्म पुन्यों से ही प्राप्त होता है. इन्हीं चार धामों में से एक प्रसिद्ध धाम बद्रीनाथ धाम है. बद्रीनाथ धाम भगवान श्री विष्णु का धाम है. बद्रीनाथ धाम ऎसा धार्मिक स्थल है, जहां नर और नारायण दोनों मिलते है. धर्म शास्त्रों की मान्यता के अनुसार इसे विशालपुरी भी कहा जाता है. और बद्रीनाथ धाम में श्री विष्णु की पूजा होती है. इसीलिए इसे विष्णुधाम भी कहा जाता है. यह धाम हिमालय के सबसे पुराने तीर्थों में से एक है. मंदिर के मुख्य द्वार को सुन्दर चित्रकारी से सजाया गया है. मुख्य द्वार का नाम सिंहद्वार है. बद्रीनाथ मंदिर में चार भुजाओं वली काली पत्थर की बहुत छोटी मूर्तियां है. यहां भगवान श्री विष्णु पद्मासन की मुद्रा में विराजमान है. बद्रीनाथ धाम से संबन्धित मान्यता के अनुसार इस धाम की स्थापना सतयुग में हुई थी. यहीं कारण है, कि इस धाम का माहात्मय सभी प्रमुख शास्त्रों में पाया गया है. इस धाम में स्थापित श्री विष्णु की मूर्ति में मस्तक पर हीरा लगा है. मूर्ति को सोने से जडे मुकुट से सजाया गया है. यहां की मुख्य मूर्ति के पास अन्य अनेक मूर्तियां है. जिनमें नारायण, उद्ववजी, कुबेर व नारदजी कि मूर्ति प्रमुख है. मंदिर के निकट ही एक कुंड है, जिसका जल सदैव गरम रहता है. बद्रीनाथ धाम भगवान श्री विष्णु का धाम है, इसीलिए इसे वैकुण्ठ की तरह माना जाता है. यह माना जाता है, कि महर्षि वेदव्याज जी ने यहीं पर महाभारत और श्रीमदभागवत महान ग्रन्थों की रचना हुई है. यहां भगवान श्री कृ्ष्ण को केशव के नाम से जाना जाता है. इसके अतिरिक्त इस स्थान पर क्योकि देव ऋषि नारद ने भी तपस्या की थी. देव ऋषि नारद के द्वारा तपस्या करने के कारण यह क्षेत्र शारदा क्षेत्र के नाम से प्रसिद्ध है. यहां आकर तपस्या करने वालों में उद्वव भी शामिल है. इन सभी की मूर्तियां यहां मंदिर में रखी गई है. मंदिर के निकट ही अन्य अनेक धार्मिक स्थल है. जिसमें नारद कुण्ड, पंचशिला, वसुधारा, ब्रह्माकपाल, सोमतीर्थ, माता मूर्ति,शेष नेत्र, चरण पादुका, अलकापुरी, पंचतीर्थ व गंगा संगम.

Monday, December 26, 2016

केदारनाथ यात्रा : तैयारियां और जानकारियां

केदारनाथ यात्रा : तैयारियां और जानकारियां



मैं न तो कोई लेखक हूँ और न ही लेखक बनने की कोई इच्छा रखता हूँ। बस अपनी यादों को संभाल कर रखने के लिए मैं ये ब्लॉग लिख रहा हूँ। मेरा ये ब्लॉग पढ़कर आप ऐसा महसूस करेंगे जैसे ये यात्रा मैंने नहीं आप खुद ही किये हैं। इसमें जो भाषा और शैली मैंने प्रयोग किया है उससे आपको बिलकुल अपनेपन का अहसास होगा।अपने इस ब्लॉग में मैं केदरनाथ और बद्रीनाथ यात्रा के बारे में आपको बताऊंगा। वहाँ जाने से पहले मैंने इंटरनेट पर केदारनाथ के बारे में बहुत खोजबीन की पर कोई ऐसा तथ्य नहीं मिला जिसके आधार पर अपनी यात्रा की योजना बना सकूं और एक लेख मिला भी तो योजना बनाने के लिए नाकाफी था। फिर भी किसी तरह इस यात्रा की रूपरेखा तैयार हो गयी। बहुत सोच विचार के बाद कि किस दिन कहाँ तक जाना है और कहाँ रुकना है, और अगर पूर्वनियोजित योजना के अनुसार यात्रा में कुछ दिक्क्तें आती है तो उससे किस तरह निपटा और आगे की यात्रा को सकुशल पूरा किया जाये। मैं, मेरी पत्नी (कंचन), मेरा बेटा (अदित्यानन्द), मेरी माताजी और मेरे पिताजी कुल 5 लोगों के लिए मैंने यात्रा की योजना बनाई। बहुत सोचने के बाद मैंने 4 जून (शानिवार) 2016 को दिल्ली से प्रस्थान करने की योजना बनाई। सबसे पहले मैंने दिल्ली से हरिद्वार के लिए मसूरी एक्सप्रेस (ट्रेन संख्या 14041) का 5 टिकट बुक किया। मम्मी और पिताजी का 3 जून का टिकट पटना से दिल्ली के लिए बुक किया. जहाँ जहाँ भी हमलोगों को रुकना था वहाँ के लिए मैंने उत्तराखण्ड सरकार द्वारा संचालित गेस्ट हाउस गढ़वाल मंडल विकास निगम के गेस्ट हाउस (http://www.gmvnl.in) ही बुक किया था। ये एक ऐसी यात्रा है जहाँ आपको बहुत ही सचेत रहने की जरुरत है। इस यात्रा में आपको कुछ चीज़े अपने साथ जरूर रख लेनी होगी।